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मध्यस्थता विधेयक, 2021

मध्यस्थता विधेयक, 2021- यूपीएससी परीक्षा के लिए प्रासंगिकता

  • सामान्य अध्ययन II- संसद एवं राज्य विधानमंडल

हिंदी

मध्यस्थता का क्या अर्थ है?

  • मध्यस्थता: मध्यस्थता एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पक्ष पारस्परिक रूप से चयनित निष्पक्ष एवं तटस्थ व्यक्ति से मिलते हैं जो उनके मतभेदों  पर समझौते में उनकी सहायता करता है।
  • पक्षकारों को एक साथ लाता है: पक्षकार अपने संबंधों को, जैसे पारिवारिक विवाद या व्यावसायिक विवाद के दौरान सुरक्षित कर सकते हैं एवं कभी-कभी पुनर्निर्माण कर सकते हैं।
  • अत्यधिक सुविधाजनक: पक्षकार काफी हद तक कार्यवाही के समय, स्थान एवं अवधि को नियंत्रित कर सकती हैं। अनुसूचीकरण (शेड्यूलिंग) न्यायालयों की सुविधा के अधीन नहीं है।

 

मध्यस्थता विधेयक, 2021: भारत की आवश्यकता

  • जबकि भारत में मध्यस्थता के लिए कोई स्वयं सिद्ध (स्टैंडअलोन) विधान नहीं है, अनेक क़ानून हैं जिनमें मध्यस्थता प्रावधान सम्मिलित हैं, जैसे कि नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908, मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996, कंपनी अधिनियम, 2013, वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015, तथा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019।
  • सर्वोच्च न्यायालय का अधिदेश: भारत के सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता एवं सुलह परियोजना समिति ने मध्यस्थता को संघर्ष समाधान के लिए एक आजमाए एवं परखे हुए विकल्प के रूप में वर्णित किया है।
  • एक अंतरराष्ट्रीय हस्ताक्षरकर्ता: चूंकि भारत मध्यस्थता पर सिंगापुर अभिसमय का एक हस्ताक्षरकर्ता है (औपचारिक रूप से यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल सेटलमेंट एग्रीमेंट जो मध्यस्थता से उत्पन्न होता है), घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता को नियंत्रित करने वाला कानून निर्मित करना उचित है।

 

मध्यस्थता विधेयक, 2021: प्रमुख विशेषताएं

  • विधेयक का उद्देश्य विवादों, वाणिज्यिक एवं अन्यथा को हल करने के लिए मध्यस्थता, विशेष रूप से संस्थागत मध्यस्थता को बढ़ावा देना, प्रोत्साहित करना तथा सुविधा प्रदान करना है।
  • विधेयक आगे मुकदमेबाजी से पूर्व अनिवार्य मध्यस्थता का प्रस्ताव करता है तथा यह तत्काल राहत के लिए सक्षम न्यायिक मंचों/ न्यायालयों से संपर्क करने के वादियों के अधिकारों की रक्षा करता है।
  • मध्यस्थता प्रक्रिया गोपनीय होगी एवं कतिपय मामलों में इसके प्रकटीकरण के विरुद्ध प्रतिरक्षा प्रदान की जाती है।
  • मध्यस्थता निपटान समझौते (मेडिएशन सेटेलमेंट एग्रीमेंट/एमएसए) के रूप में मध्यस्थता प्रक्रिया का परिणाम विधिक रूप से प्रवर्तनीय होगा एवं निपटान के प्रमाणित रिकॉर्ड सुनिश्चित करने के लिए 90 दिनों के भीतर राज्य जिला या तालुक कानूनी अधिकारियों के साथ पंजीकृत किया जा सकता है।
  • विधेयक भारतीय मध्यस्थता परिषद की स्थापना करता है एवं सामुदायिक मध्यस्थता का भी प्रावधान करता है।
  • यदि पक्षकार सहमत हैं, तो वे किसी भी व्यक्ति को मध्यस्थ के रूप में नियुक्त कर सकते हैं। यदि नहीं, तो वे मध्यस्थों के पैनल से किसी व्यक्ति को नियुक्त करने के लिए मध्यस्थता सेवा प्रदाता को आवेदन कर सकते हैं।
  • विधेयक उन विवादों को सूचीबद्ध करता है जो मध्यस्थता के लिए उपयुक्त नहीं हैं (जैसे कि आपराधिक अभियोजन अथवा तृतीय पक्ष के अधिकारों को प्रभावित करने वाले)। केंद्र सरकार इस सूची में संशोधन कर सकती है।
  • मध्यस्थता प्रक्रिया को 180 दिनों के भीतर पूरा किया जाना चाहिए, जिसे पक्षकारों द्वारा 180 दिनों के लिए और बढ़ाया जा सकता है।

 

मध्यस्थता विधेयक, 2021: चिंताएं

  • विधायक के अनुसार, कोई भी वाद ((मुकदमा) दायर करने अथवा न्यायालय में कार्यवाही से पूर्व दोनों पक्षों के लिए मुकदमेबाजी-पूर्व मध्यस्थता अनिवार्य है, चाहे उनके बीच मध्यस्थता समझौता हो या नहीं।
  • जो पक्ष बिना उचित कारण के मुकदमेबाजी-पूर्व मध्यस्थता में भाग लेने में विफल रहते हैं, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। यद्यपि, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, न्याय तक पहुँच एक संवैधानिक अधिकार है जिसे बंधन लगाया अथवा प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है। मध्यस्थता केवल स्वैच्छिक होनी चाहिए और इसे अन्यथा संभव बनाना न्याय से वंचित करना होगा।
  • विधेयक के खंड 26 के अनुसार, न्यायालय द्वारा संलग्न मध्यस्थता, जिसमें मुकदमा-पूर्व मध्यस्थता भी शामिल है, सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों द्वारा बनाए गए निर्देशों या नियमों के अनुसार संचालित की जाएगी। हालांकि कमेटी ने इसका विरोध किया। इसमें कहा गया है कि खंड 26 संविधान की भावना के  विरुद्ध है। सामान्य विधि प्रणाली (कॉमन लॉ सिस्टम) का पालन करने वाले देशों में, यह एक स्वस्थ परंपरा है कि क़ानून के अभाव में, शीर्ष न्यायालय के फैसले एवं निर्णय समान महत्व रखते हैं। जिस क्षण कोई कानून पारित हो जाता है, वह न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्देशों अथवा निर्णयों के स्थान पर मार्गदर्शक शक्ति बन जाता है। अतः, खंड 26 असंवैधानिक है।
  • विधेयक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को स्थानीय मानता है जब इसे भारत में संचालित किया जाता है एवं निपटारे को एक न्यायालय के फैसले अथवा डिक्री के रूप में मान्यता दी जाती है। सिंगापुर अभिसमय उन समझौतों पर लागू नहीं होता है जिनके पास पहले से ही निर्णय या डिक्री की स्थिति है। परिणाम स्वरूप, भारत में सीमा पार मध्यस्थता आयोजित करने से विश्वव्यापी प्रवर्तनीयता के असीम लाभ अपवर्जित हो जाएंगे।

 

निष्कर्ष

  • विवादों के त्वरित समाधान को सक्षम करने के लिए, हितधारकों के साथ चर्चा के पश्चात विधेयक को लागू किया जाना चाहिए एवं मुद्दों को सौहार्दपूर्ण तरीके से हल करना चाहिए। भारत के लिए सरल व्यापारिक लेनदेन के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र बनने हेतु यह एक उचित अवसर है।

 

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