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चीनी निर्यात पर प्रतिबंध: भारत का चीनी निर्यात, प्रतिबंध की आवश्यकता तथा उनके प्रभाव

चीनी निर्यात पर प्रतिबंध- यूपीएससी परीक्षा के लिए प्रासंगिकता

  • जीएस पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था-  आयोजना, संसाधनों का अभिनियोजन, वृद्धि, विकास एवं रोजगार से संबंधित मुद्दे।

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समाचारों में चीनी निर्यात पर प्रतिबंध

  • हाल ही में, केंद्र सरकार ने अधिसूचित किया है कि चीनी निर्यात को प्रतिबंधित किया जाएगा, या केवल अनुज्ञा के साथ ही अनुमति दी जाएगी।
  • भारत चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक तथा ब्राजील के बाद दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है।

 

चीनी निर्यात पर प्रतिबंध के बारे में प्रमुख तथ्य

  • चीनी निर्यात प्रतिबंध, चार वर्षों में इस प्रकार का पहला कदम, “चीनी की घरेलू उपलब्धता  तथा मूल्य स्थिरता” को बनाए रखने का आदेश दिया गया है।
  • पूर्व अनुमति: सरकार ने चीनी के निर्यात को ‘मुक्त श्रेणी’ से, ‘प्रतिबंधित’ श्रेणी में स्थानांतरित कर दिया है, जिसके लिए किसी सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
    • इसका अर्थ है कि चीनी के निर्यात की अनुमति केवल चीनी निदेशालय, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ फूड एंड पब्लिक डिसटीब्यूशन/DFPD), उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय से विशिष्ट अनुमति के साथ है।
  • अवधि: चीनी निर्यात पर प्रतिबंध 1 जून से प्रवर्तन में होगा तथा 31 अक्टूबर तक या अगले आदेश तक जारी रहेगा।

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यह गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध से किस प्रकार भिन्न है?

  • विशेषज्ञों ने बताया है कि गेहूं के विपरीत, जहां निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, चीनी का निर्यात जारी रहेगा, किंतु 1 जून से शिपमेंट को बाहर भेजने के लिए अनुमति की आवश्यकता होगी।
  • 1 जून से, लंबित अनुबंधित मात्रा तथा चीनी मिलों द्वारा प्रारंभ किए गए किसी भी नए अनुबंध दोनों के लिए निर्यात की अनुमति की आवश्यकता होगी।

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भारत से चीनी निर्यात

  • विगत चार मौसमों में भरपूर उत्पादन के कारण निर्यात में भी उछाल आया है। केंद्र ने विदेशों में बिक्री बढ़ाने के लिए मिल मालिकों को सहायिकी (सब्सिडी) भी प्रदान की।
  • चीनी के मौसम (प्रत्येक वर्ष अक्टूबर से सितंबर) आरंभ होने से पूर्व केंद्र सरकार निर्यात के लिए कोटा तथा लक्ष्य प्राप्त करने हेतु सब्सिडी दोनों की घोषणा करेगी।
  • भारत से चीनी निर्यात: पिछले चार मौसमों  से भारत से चीनी निर्यात के आंकड़े निम्नलिखित हैं-
  • 2017-18 सीजन: सरकार ने 20 लाख टन चीनी निर्यात करने का लक्ष्य रखा एवं आंतरिक परिवहन, माल ढुलाई, प्रबंधन तथा कतिपय अन्य कार्यों को संभालने के लिए 1,540 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया।
    • उस सीज़न के लिए, उद्योग ने 6.2 लाख टन का निर्यात दर्ज किया एवं सहायिकी बजट के 440 करोड़ रुपये का व्यय किया।
  • 2018-19 सीजन: 5,538 करोड़ रुपये के सब्सिडी बजट के साथ 50 लाख टन निर्यात लक्ष्य निर्धारित किया गया था, जिसमें से सब्सिडी के 4,263 करोड़ रुपये का उपयोग करके 38 लाख टन चीनी बाहर भेज दिया गया था।
  • 2019-20 सीज़न: 6,268 करोड़ रुपये के सब्सिडी बजट के साथ निर्यात कोटा बढ़ाकर 60 लाख टन कर दिया गया।
    • मिल मालिकों (मिलर्स) ने सब्सिडी बजट के 6,225 करोड़ रुपये का उपयोग करके 59.60 लाख टन का निर्यात किया।
  • 2020-21 सीजन: अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खिंचाव (कर्षण) ने 2020-21 में चीनी निर्यात को 70 लाख टन को प्राप्त करने में सहायता की।
    • कुल में से 60 लाख टन 3,500 करोड़ रुपये की सरकारी सब्सिडी का उपयोग करके निर्यात किया गया था  तथा 10 लाख टन बिना किसी सरकारी सहायता के निर्यात किया गया था।
  • चालू सीजन (2021-22): इस वर्ष मिल मालिकों द्वारा 90 लाख टन चीनी निर्यात करने के अनुबंध किए गए।
    • इसमें से 71 लाख टन चीनी पहले ही देश से निर्यात की जा चुकी है।
    • एक जून के बाद निर्यात की जाने वाली खेप को सरकार की अनुमति की आवश्यकता होगी।

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चीनी निर्यात पर अंकुश लगाने की आवश्यकता

  • संभावित आपूर्ति बाधाएं: उद्योग के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि निर्यात, अंतरराष्ट्रीय मांग को देखते हुए बेरोकटोक जारी रह सकता है। किंतु सरकार के लिए, एक संभावित चिंता अगले सीजन के प्रारंभ में  निम्न स्टॉक है। इससे करीब तीन माह तक आपूर्ति बाधित हो सकती है।
  • बढ़ती मुद्रास्फीति: यदि मंदी के दौर के दौरान पूर्तिकर भंडार (बैक-अप स्टॉक) की कमी होती है तो घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं।
    • ऐसे समय में जब मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करना एक प्रमुख प्राथमिकता है, सरकार उस जोखिम को वहन नहीं कर सकती है।

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निष्कर्ष

  • चीनी निर्यात पर वर्तमान प्रतिबंध यह सुनिश्चित करेगा कि सरकार चीनी स्टॉक पर समयोचित दृष्टि रखे ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अगले सीजन के प्रारंभ में कोई कमी न हो।
    • चीनी की खुदरा कीमतें साल-दर-साल लगभग स्थिर रही हैं, जो 39.50 रुपये से 41 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच आगे पीछे हो रही हैं।

 

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