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स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण को सुदृढ़ करने हेतु व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिए नीति दिशानिर्देश: प्रासंगिकता
- जीएस 3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन।
स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण को सुदृढ़ करने हेतु व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिए नीति दिशानिर्देश: प्रसंग
- नीति आयोग ने हाल ही में स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण को सुदृढ़ करने हेतु व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत दिशानिर्देश जारी किए हैं।
स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण (डब्ल्यूएसएस) अर्थ
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम (सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स), 2016 में कहा गया है कि यह उत्पादकों का उत्तरदायित्व है कि वह अपशिष्ट को तीन श्रेणियों- गीला, सूखा एवं खतरनाक अपशिष्ट के रूप में पृथक करें एवं फ्री तक किए गए अपशिष्ट को अधिकृत अपशिष्ट संग्रहकर्ताओं अथवा स्थानीय निकायों को सौंपे। इसे प्रायः स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण (डब्ल्यूएसएस) कहा जाता है।
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स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण: क्यों आवश्यक है?
- भारत प्रतिवर्ष लगभग8 मिलियन टन ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करता है।
- विश्व भर में वार्षिक अपशिष्ट उत्पादन का अनुमान लगभग 2 बिलियन टन है एवं इसके 4 बिलियन टन तक बढ़ने की संभावना है, जो 2050 तक 70% की वृद्धि होगी।
- भारत जैसे देश जो दक्षिण-एशिया एवं उप-सहारा अफ्रीका के विश्व के सर्वाधिक तीव्र गति से वृद्धि करते क्षेत्रों के अंतर्गत आते हैं, 2050 तक अपशिष्ट उत्पादन में तीन गुना वृद्धि देखने का अनुमान है।
- अध्ययनों से पता चलता है कि अपशिष्ट प्रबंधन तीव्र गति से प्राथमिकता की स्थिति प्राप्त कर रहा है, विश्व स्तर पर लगभग 33% अपशिष्ट का प्रबंधन अभी भी पर्यावरण की दृष्टि से युक्तियुक्त विधि से नहीं किया जा रहा है।
- भारत विरासती अपशिष्ट के मुद्दे का सामना कर रहा है, अर्थात वह अपशिष्ट जो वर्षों से अपशिष्ट स्थल (डंप) में असेवित एवं अनुपचारित छोड़ दिया गया है।
- अधिकांश भारतीय शहर अपशिष्ट के प्रभावी संग्रह, उपचारण एवं निस्तारण हेतु अपर्याप्त वित्त एवं आधारिक संरचना से जूझ रहे हैं।
- अपशिष्ट भराव क्षेत्र (लैंडफिल) में जैव निम्नीकरणीय (बायोडिग्रेडेबल) अपशिष्ट मीथेन मुक्त करता है, जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 100 वर्षों में 34 गुना अधिक वैश्विक तापन क्षमता है।
- यह अनुमान है कि बड़े महानगरों में जहां 70-95% अपशिष्ट एकत्र किया जाता है, वहीं संग्रह छोटे शहरों में 50% जितना कम हो सकता है।
स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण: लाभ
- स्रोत पृथक्करण द्वितीयक पृथक्करण की आवश्यकता को कम करता है, जो पूंजी, ऊर्जा एवं भूमि गहन है।
- स्रोत पर पृथक किए गए अपशिष्ट के अन्य प्रकार के अपशिष्ट से दूषित होने की संभावना कम होती है एवं इसलिए इसके पुनर्चक्रण की संभावना अधिक होती है। चूंकि इसके स्वच्छ होने की संभावना भी अधिक होती है, अतः पुनर्चक्रण या पुन: उपयोग से पहले पूर्व-उपचारण की लागत भी कम हो जाती है। उपरोक्त कारणों से, स्रोत पर पृथक किया गया आपसे पुनर्चक्रण करने वालों के लिए अधिक आकर्षक है।
- विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट हेतु उपचारण अथवा पुनर्चक्रण विकल्प, अपशिष्ट की प्रकृति पर निर्भर करता है। अधिकांश बार, प्रक्रियाएं बोझिल एवं महंगी होती हैं। अपशिष्ट पृथक्करण उपचारित या पुनर्चक्रित किए जाने वाले अपशिष्ट की मात्रा को कम करने में योगदान देता है, जिससे लागत कम होती है।
- यह सामुदायिक खाद इकाइयों एवं सूखे अपशिष्ट संग्रह केंद्रों जैसे विकेन्द्रीकृत उपचारण विकल्पों का भी समर्थन करता है जो अपशिष्ट प्रबंधन में अधिक कुशल हैं।
- स्रोत पृथक्करण एवं पुनर्चक्रण के परिणामस्वरूप अपशिष्ट अल्पीकरण होता है, अथवा कम मात्रा में अपशिष्ट, अपशिष्ट भराव क्षेत्र (लैंडफिल) तक पहुंचता है। यह प्रत्यक्ष रुप से अपशिष्ट भराव क्षेत्र के दीर्घ जीवन काल में परिवर्तित हो जाता है एवं नए अपशिष्ट भराव क्षेत्र हेतु भूमि की मांग में कमी आती है।
- प्राथमिक एवं द्वितीयक पृथक्करण के परिणामस्वरूप अपशिष्ट न्यूनीकरण भी अपशिष्ट डंप एवं लैंडफिल से हरितगृह-गैस उत्सर्जन को कम करता है।
- स्रोत पृथक्करण वर्तमान अमानवीय आकर्षण को कम करता है, अपशिष्ट संग्राहकों (कचरा बीनने वालों) की अस्वास्थ्यकर एवं खतरनाक प्रथा कचरे के ढेर के माध्यम से बिक्री योग्य अपशिष्ट वस्तुओं को खोजने के लिए अफवाह है।
- स्रोत पृथक्करण वर्तमान , अपशिष्ट संग्राहकों (कचरा बीनने वालों) की कचरे के ढेर के माध्यम से बिक्री योग्य अपशिष्ट वस्तुओं के निस्तारण हेतु खोजने की अमानवीय, अस्वास्थ्यकर एवं खतरनाक प्रथा के आकर्षण को कम करता है






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