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भारत एवं इसके सैन्य झंडे तथा चिन्हों को अपनाना- यूपीएससी परीक्षा के लिए प्रासंगिकता
- सामान्य अध्ययन I- आधुनिक इतिहास।
भारत एवं इसके सैन्य झंडे तथा चिन्हों को अपनाना चर्चा में क्यों है?
नई नौसेना पताका (ध्वज), जिसका कोच्चि में प्रधानमंत्री द्वारा अनावरण किया जाएगा, ने स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय सेना द्वारा अपनाए गए झंडों एवं रैंकों पर ध्यान केंद्रित किया है।
- भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त दस्तावेजों से ज्ञात होता है कि भारत के पूर्व वायसराय एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने नए झंडे तथा रैंक चिन्ह का सुझाव देने में एक प्रमुख भूमिका निभाई थी।
- यह तब की बात है जब 26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतंत्र बनने वाला था।
तथ्य
- युगल स्वर्णिम सीमाओं के साथ अष्टकोणीय आकार महान भारतीय सम्राट, छत्रपति शिवाजी महाराज की मुहर से प्रेरणा ग्रहण करता है, जिनके दूरदर्शी सामुद्रिक दृष्टिकोण ने एक विश्वसनीय नौसैनिक बेड़े की स्थापना की थी।
भारत ने ब्रिटिश युग के झंडे एवं रैंक को कब बदला?
- 26 जनवरी 1950 से पूर्व, जिस दिन भारत एक गणतंत्र बन गया था, सेना के रैंकों के झंडे तथा चिन्ह (बैज) ब्रिटिश पैटर्न के थे।
- थल सेना, नौसेना एवं वायु सेना के झंडों के नवीन, भारतीय प्रतिरूप तथा सेना के रेजिमेंटल झंडे एवं तीनों सेवाओं के रैंकों के बैज को 26 जनवरी, 1950 को अपनाया गया था।
- भारतीय सैन्य अधिकारियों को दिए गए ‘किंग्स कमीशन’ को भी उसी तिथि में परिवर्तित कर ‘इंडियन कमीशन’ कर दिया गया।
- तथा बाद की तिथि में भारतीय सैन्य अकादमी (इंडियन मिलिट्री अकैडमी/IMA), देहरादून में विभिन्न रेजिमेंटों के किंग्स कलर को त्याग दिया गया।
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लॉर्ड माउंटबेटन एवं राष्ट्रीय अभिलेखागार
- राष्ट्रीय अभिलेखागार में 1949 की फाइलें हैं, जिसमें लॉर्ड माउंटबेटन से सशस्त्र बलों के नाम, झंडे तथा रैंक के बारे में एक विस्तृत नोट एवं फिर माउंटबेटन के सुझावों के बारे में तत्कालीन रक्षा मंत्री बलदेव सिंह को प्रधानमंत्री नेहरू का पत्र शामिल है।
- अभिलेखों से ज्ञात होता है कि यह नोट नेहरू को लॉर्ड माउंटबेटन ने तब दिया था जब दोनों लंदन में मिले थे।
- यह नोट 24 मई, 1949 को प्रधानमंत्री कार्यालय से तत्कालीन गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी के कार्यालय में भेजा गया था, जिसमें कहा गया था कि यह भारत के गणतंत्र बनने के पश्चात ‘भारतीय सशस्त्र बलों के नाम एवं प्रतीक चिन्ह’ के मुद्दे पर है।
- पत्र में यह भी कहा गया है कि नोट को गवर्नर जनरल के समक्ष रखा जाना चाहिए।
- नोट की शुरुआत यह कहते हुए होती है कि गणतंत्र बनने के अच्छा भारत की थल सेना, नौसेना एवं वायु सेना से ‘रॉयल’ शब्द हटा दिया जाएगा।
- माउंटबेटन ने दृढ़ता से सिफारिश की कि ‘स्टेट’ ऑफ ‘रिपब्लिकन’ के जैसे किसी अन्य शब्द द्वारा ‘रॉयल’ शब्द को प्रतिस्थापित नहीं किया जाना चाहिए।
- ऐसा इसलिए था क्योंकि इससे भारत की सेनाओं को राष्ट्रमंडल में अन्य सेवाओं से मनोवैज्ञानिक रूप से पृथक किए जाने का प्रभाव पड़ेगा।
- उन्होंने पत्र में आगे सुझाव दिया कि मुकुट (क्राउन) को प्रतीक चिन्ह से बदल दिया जाना चाहिए एवं “अशोक स्तंभ के तीन सिंहों” द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए।
- नौसेना की पताका (नेवल एनसाइन) के बारे में उन्होंने कहा कि राष्ट्रमंडल की सभी नौसेनाएं एक ही झंडा फहराती हैं जिसमें रेड-क्रॉस के साथ एक बड़ा सफेद झंडा होता है एवं छड़ी के पास ऊपरी कोने में यूनियन जैक होता है तथा इसे श्वेत पताका (‘व्हाइट एनसाइन’) के रूप में जाना जाता है।
- नोट में सुझाव दिया गया है कि, नए पताका में रेड-क्रॉस जारी रहना चाहिए, किंतु भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को यूनियन जैक को प्रतिस्थापित करना चाहिए ताकि राष्ट्रमंडल ध्वज के साथ समानता हो सके।
वर्दी के लिए परिवर्तन
- उन्होंने दृढ़ता से आग्रह किया कि वर्तमान वर्दी को यथासंभव न्यूनतम रूप से बदला जाना चाहिए।
- उन्होंने कहा कि मेजर एवं उससे ऊपर के रैंक के बैज पर पहने जाने वाले क्राउन को “अशोक के तीन सिंहों” से प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए।
- द स्टार ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ़ द बाथ को स्टार ऑफ़ इंडिया या किसी अन्य प्रकार के स्टार द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए।
- उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि जनरलों के रैंक के बैज पर क्रॉस तलवार एवं डंडों को बरकरार रखा जाना चाहिए।
- पूर्व वायसराय ने नौसेना एवं वायु सेना में रैंक की धारियों को बनाए रखने की वकालत करते हुए कहा कि ये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगभग समान हैं।
माउंटबेटन के सुझावों पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया
- नेहरू ने सितंबर 1949 में तत्कालीन रक्षा मंत्री को पत्र लिखकर कहा था कि वह पूर्व गवर्नर जनरल द्वारा दिए गए सुझावों से सहमत हैं कि जितना संभव हो उतना कम बदलाव होना चाहिए।
- तत्कालीन प्रधान मंत्री ने विशेष रूप से नौसेना के लिए माउंटबेटन द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों का उल्लेख किया।
- तत्कालीन गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी ने भी मई 1949 में ही माउंटबेटन के सुझावों पर सहमति व्यक्त करते हुए नेहरू को पत्र लिखा था।
- अंत में, माउंटबेटन के लगभग सभी सुझावों को स्वीकार कर लिया गया एवं 26 जनवरी, 1950 से लागू किया गया।




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