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निवारक निरोध (प्रिवेंटिव डिटेंशन) कानून

निवारक निरोध- यूपीएससी परीक्षा के लिए प्रासंगिकता

  • सामान्य अध्ययन II- राजव्यवस्था एवं शासन।

निवारक निरोध (प्रिवेंटिव डिटेंशन) कानून -_3.1

निवारक निरोध (प्रिवेंटिव डिटेंशन) चर्चा में क्यों है?

  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो/एनसीआरबी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 1.1 लाख से अधिक लोगों को निवारक निरोध में रखने के साथ, 2021 में निवारक निरोध में एक वर्ष पूर्व की तुलना में 7% से अधिक की वृद्धि देखी गई।

 

निवारक निरोध क्या है?

  • निवारक निरोध का अर्थ है किसी व्यक्ति को निरुद्ध करना ताकि उस व्यक्ति को किसी भी संभावित अपराध को कारित करने से रोका जा सके।
  • दूसरे शब्दों में, निवारक निरोध प्रशासन द्वारा इस संदेह के आधार पर की गई कार्रवाई है कि संबंधित व्यक्ति द्वारा कुछ गलत कार्य किए जा सकते हैं जो राज्य के लिए प्रतिकूल होंगे।

 

भारत में निवारक निरोध

एक पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना एवं बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकता है यदि उसे कोई जानकारी मिलती है कि ऐसा व्यक्ति कोई अपराध कारित कर सकता है।

  • निवारक निरोध कानून, 1950: इस कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार एवं निरुद्ध किया जा सकता है यदि उसकी स्वतंत्रता देश की सुरक्षा, विदेशी संबंधों, सार्वजनिक हितों अथवा देश के लिए अन्यथा आवश्यक है।
  • गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट/यूएपीए) 1968: यूएपीए कानून के दायरे में भारतीय राज्य किसी भी संगठन को अवैध घोषित कर सकता है एवं यदि उक्त संगठन या व्यक्ति ने क्षेत्रीय रूप से भारतीय संप्रभुता की आलोचना की है/भारतीय संप्रभुता पर प्रश्न उठाया है तो किसी को भी पूछताछ के लिए कैद किया जा सकता है।

 

निवारक निरोध एवं गिरफ्तारी में क्या अंतर है?

  • एक ‘गिरफ्तारी’ तब की जाती है जब किसी व्यक्ति पर अपराध कारित करने का आरोप लगाया जाता है।
  • निवारक निरोध के मामले में, एक व्यक्ति को निरुद्ध किया जाता है क्योंकि उसे केवल कुछ ऐसा करने से प्रतिबंधित किया जाता है जिससे विधि-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 कुछ मामलों में गिरफ्तारी एवं निरोध से सुरक्षा प्रदान करता है।

 

भारत में एक गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(1) और 22(2) के अनुसार:

  • किसी व्यक्ति को यह बताए बिना गिरफ्तार एवं निरुद्ध नहीं लिया जा सकता है कि उसे क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है।
  • गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को उसकी पसंद के विधि व्यवसायी द्वारा बचाव करने से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि गिरफ्तार व्यक्ति को अपना बचाव करने के लिए किसी विधि व्यवसायी को नियुक्त करने का अधिकार है।
  • गिरफ्तार किए गए प्रत्येक व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा।
  • हिरासत में लिए गए व्यक्ति की हिरासत मजिस्ट्रेट के प्राधिकार से उक्त अवधि से अधिक नहीं हो सकती है।

 

निवारक निरोध के अपवाद

अनुच्छेद 22(3) कहता है कि उपरोक्त सुरक्षा उपाय निम्नलिखित के लिए उपलब्ध नहीं हैं:

  • यदि व्यक्ति उस समय शत्रु विदेशी है,
  • यदि व्यक्ति को “निवारक निरोध” के उद्देश्य से बनाए गए एक निश्चित कानून के तहत गिरफ्तार किया जाता है।

 

संवैधानिक प्रावधान

  • यह असाधारण है कि भारतीय संविधान के निर्माता, जिन्हें निवारक निरोध कानूनों के कारण सर्वाधिक   क्षति उठानी पड़ी, ने संवैधानिक पवित्रता देने में संकोच नहीं किया।
  • बी.आर. अम्बेडकर का मत था कि व्यक्ति की स्वतंत्रता राज्य के हितों से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • उन्होंने यह भी कहा था कि देश की स्वतंत्रता शैशवावस्था में थी एवं इसे सुरक्षित रखने हेतु निवारक निरोध आवश्यक था।

 

एनसीआरबी की रिपोर्ट

  • निवारक निरोध में रखे गए 24,500 से अधिक व्यक्ति या तो हिरासत में थे या अभी भी 2021 के अंत तक  निवारक निरोध में थे – 2017 के बाद से सबसे अधिक जब एनसीआरबी ने इस डेटा को अभिलेखित करना  प्रारंभ किया।
  • 483 से अधिक व्यक्तियों को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (नेशनल सिक्योरिटी एक्ट) के तहत निरुद्ध किया गया था, जिनमें से लगभग आधे (241) या तो हिरासत में थे या अभी भी 2021 के अंत तक निरुद्ध थे।
  • 2017 में, एनसीआरबी की भारत में अपराध की रिपोर्ट में पाया गया कि उस वर्ष 67,084 लोगों को एक निवारक उपाय के रूप में निरुद्ध किया गया था।
  • इनमें से 48,815 को उनकी निवारक निरोध की अवधि के एक से छह माह के बीच रिहा कर दिया गया था  एवं 18,269 वर्ष के अंत तक या तो हिरासत में थे या अभी भी निवारक निरोध में थे।

 

निवारक निरोध के लिए लागू किए गए विभिन्न प्रावधान

  1. अन्य कानूनों में, जिनके तहत एनसीआरबी ने निवारक निरोधों पर आंकड़ों को अभिलिखित किया है, वे हैं:
  2. गुंडा अधिनियम (राज्य एवं केंद्र) (29,306),
  3.  मादक द्रव्य एवं स्वापक औषधि अधिनियम (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट), 1988 (1,331) में अवैध तस्करी की रोकथाम, तथा
  4.  “अन्य निरोध अधिनियम” के रूप में वर्गीकृत एक श्रेणी, जिसके तहत अधिकांश निरोध दर्ज  किए गए थे (79,514)।

 

चिंताएं

  • निरुद्ध किए गए व्यक्तियों की संख्या 2017 के बाद – 2018 में 98,700 से अधिक एवं 2019 में 1.06 लाख से अधिक – 2020 में कम हो कर 89,405 (लॉकडाउन के कारण) होने से पूर्व से बढ़ रही है।
  • निवारक निरोध के तहत निरुद्ध किए गए व्यक्तियों की संख्या में 2021 में वृद्धि देखी गई है।

 

निवारक निरोध के साथ मुद्दे

  • स्वेच्छाचारिता: पुलिस यह निर्धारित करती है कि क्या कोई व्यक्ति खतरा उत्पन्न करता है अथवा नहीं, इसका परीक्षण प्रमुख साक्ष्यों द्वारा नहीं किया जाता है अथवा कानूनी रूप से प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा जांच नहीं की जाती है।
  • अधिकारों का उल्लंघन: प्रायः, निरुद्ध किए गए व्यक्ति के लिए कोई मुकदमा (3 माह तक) नहीं होता है, कोई आवधिक समीक्षा नहीं होती है एवं कोई विधि सहायता उपलब्ध नहीं होती है।
  • दुर्व्यवहार: यह कोई प्रक्रियात्मक सुरक्षा प्रदान नहीं करता है जैसे कि यातना एवं भेदभावपूर्ण उपचार के लिए बंदियों की संवेदनशीलता को कम करना एवं विध्वंसक गतिविधियों के लिए अधिकारियों द्वारा निवारक निरोध का दुरुपयोग करने से रोकना।
  • दमन के लिए उपकरण: उचित सुरक्षा उपायों के अभाव में, विशेष रूप से दलितों एवं अल्पसंख्यकों के  विरुद्ध निवारक निरोध का दुरुपयोग किया गया है।

 

शीर्ष न्यायालय के हालिया निर्णय

  • सार्वजनिक अव्यवस्था को रोकने के लिए निवारक निरोध एक आवश्यक बुराई है, 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय सुनाया।
  • राज्य को सभी विविध ” विधि एवं व्यवस्था” समस्याओं से निपटने के लिए स्वेच्छाचारी ढंग से “निवारक निरोध” का आश्रय नहीं लेना चाहिए, जिसे देश की सामान्य विधियों द्वारा हल किया जा सकता है।
  • जब भी एक निवारक निरोध कानून के तहत किसी व्यवस्था को चुनौती दी जाती है, तो न्यायालय को इसकी वैधता निर्धारित करने में एक प्रश्न पूछना चाहिए: क्या देश की सामान्य विधि स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त थी?
  • यदि उत्तर सकारात्मक है, तो निरोध आदेश अवैध होगा।

 

अनुच्छेद 21

  • निवारक निरोध अनुच्छेद 21 (विधि की सम्यक प्रक्रिया) के साथ अनुच्छेद 22 (मनमाने ढंग से गिरफ्तारी  एवं निरुद्ध के प्रति सुरक्षा) एवं विचाराधीन क़ानून के चार कोनों के भीतर होना चाहिए, न्यायमूर्ति नरीमन ने यह निर्णय दिया।
  • एक नागरिक की स्वतंत्रता हमारे पूर्वजों द्वारा लंबे, ऐतिहासिक एवं कठिन संघर्षों के पश्चात प्राप्त किया गया  सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिकार है।

 

आगे की राह

  • इस तरह के कृत्य करने से असामाजिक एवं विध्वंसक तत्वों पर निरोधात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • भारत एक विशाल देश है एवं राष्ट्रीय सुरक्षा तथा अखंडता के विरुद्ध अनेक अलगाववादी प्रवृत्तियां मौजूद हैं  तथा विध्वंसक गतिविधियों का मुकाबला करने के लिए एक सख्त कानून की आवश्यकता है।
  • इन कृत्यों में निरुद्ध किए गए व्यक्तियों की संख्या बहुत बड़ी नहीं है एवं निवारक निरोध से पूर्व उचित ध्यान दिया जाता है।
  • राज्य के पास उन कृत्यों से निपटने के लिए बहुत प्रभावी शक्तियाँ होनी चाहिए जिनमें नागरिक शत्रुतापूर्ण गतिविधियों, जासूसी, बल प्रयोग, आतंकवाद इत्यादि में सम्मिलित हों।

 

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