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पश्चिमी घाट पर कस्तूरीरंगन समिति

पश्चिमी घाट पर कस्तूरीरंगन समिति: प्रासंगिकता

  • जीएस 3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन।

 

पश्चिमी घाट पर कस्तूरीरंगन समिति: प्रसंग

  • हाल ही में कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने केंद्र को सूचित किया है कि कर्नाटक राज्य पश्चिमी घाट पर कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट का विरोध कर रहा है

 

पश्चिमी घाट पर कस्तूरीरंगन समिति: मुख्य बिंदु

  • मुख्यमंत्री ने कहा है कि पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने से क्षेत्र के निवासियों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
  • दूसरी ओर, विशेषज्ञों ने राज्य के विरोध को पारिस्थितिक रूप से नाजुक पश्चिमी घाट के लिए विनाशकारी बताया।

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कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशें

  • कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट में पश्चिमी घाट के कुल क्षेत्रफल के 37 प्रतिशत को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र (ईएसए) घोषित करने का प्रस्ताव है।
    • पश्चिमी घाट का 37% कुल क्षेत्रफल का 60,000 वर्ग किलोमीटर है।
  • इसमें से 20,000 वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र कर्नाटक के अंतर्गत पड़ता है।
  • रिपोर्ट में खनन, उत्खनन, लाल श्रेणी के उद्योगों की स्थापना एवं ताप विद्युत परियोजनाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई है।
  • समिति ने यह भी पक्ष दिया की कि इन गतिविधियों के लिए अनुमति दिए जाने से पूर्व वन एवं वन्य जीवन पर अवसंरचनागत परियोजनाओं के प्रभाव का अध्ययन किया जाना चाहिए।
  • इसके अतिरिक्त, समिति का यह भी मत था कि यूनेस्को विरासत टैग पश्चिमी घाट में मौजूद विशाल प्राकृतिक संपदा की वैश्विक एवं घरेलू पहचान स्थापित करने का एक अवसर है।
    • पश्चिमी घाट में ऐसे 39 स्थल स्थित हैं एवं राज्यों (केरल 19), कर्नाटक (10), तमिलनाडु (6) तथा महाराष्ट्र (4) में वितरित हैं।
    • इन स्थलों की सीमा, अधिकांश मामलों में, विधिक रूप से सीमांकित राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभ्यारण्यों, व्याघ्र अभयारण्यों एवं वन प्रमंडलों की सीमाएं हैं एवं इसलिए, इन्हें पहले से ही उच्च स्तर की सुरक्षा प्रदान की गई है।
  • समिति द्वारा किया गया पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र प्रतिचित्रण (इको-सेंसिटिव एरिया मैपिंग) एवं सीमांकन भी इंगित करता है कि सभी स्थल इस क्षेत्र के भीतर हैं।
  • राज्य सरकारों को इस विकास को देखना चाहिए एवं क्षेत्र के संसाधनों एवं अवसरों की सुरक्षा, संरक्षण एवं मूल्य के लिए एक योजना तैयार करनी चाहिए।
  • कर्नाटक राज्य में ईएसए का उच्चतम प्रतिशत – 46.50 प्रतिशत है।

 

सरकारों ने लगातार रिपोर्ट को खारिज क्यों किया?

  • राज्य सरकार का मानना ​​है कि रिपोर्ट के लागू होने से क्षेत्र में विकासात्मक गतिविधियों पर विराम लग जाएगा।
  • राज्य सरकार का मत था कि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट उपग्रहीय चित्रों (सैटेलाइट इमेज) के आधार पर तैयार की गई है,  किंतु वास्तविकता (जमीनी हकीकत) कुछ और है। क्षेत्र के लोगों ने कृषि एवं बागवानी गतिविधियों को पर्यावरण के अनुकूल विधि से अपनाया है।
  • साथ ही वन संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता प्रदान की गई है।
  • अतः, इस पृष्ठभूमि में, एक और कानून लाने से स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित होगी जो कि उचित नहीं है।
  • इसके अतिरिक्त, उत्तर कन्नड़ जिले के राजनीतिक प्रतिनिधियों ने सदैव कस्तूरीरंगन रिपोर्ट का विरोध किया है क्योंकि यदि रिपोर्ट को लागू किया जाता है तो 600 से अधिक गांव पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र के अंतर्गत आ जाएंगे

 

पश्चिमी घाट पर कस्तूरीरंगन समिति: रिपोर्ट के गैर-क्रियान्वयन के कारण प्रभाव

  • इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) के प्रोफेसर डॉ. टी. वी. रामचंद्र ने कहा कि जलवायु परिवर्तन आवर्ती (बार बार आने वाले) बाढ़, सूखा, भूस्खलन इत्यादि जैसी घटनाओं के माध्यम से अपरिवर्तनीय क्षति का कारण बन रहा है।
  • ये घटनाएं सभी व्यक्तियों (निर्धन अथवा समृद्ध की परवाह किए बिना) की आजीविका को प्रभावित कर रही हैं एवं देश की अर्थव्यवस्था को हानि पहुंचा रही हैं।
  • ऐसी स्थिति में, उन नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों को संरक्षित करना बेहतर होता है जिनकी लागत कम होती है बजाय इसके कि पुनर्स्थापन/पुनरुद्धार के लिए धन/संसाधन खर्च किए जाएं।
  • वन्यजीव संरक्षणवादी जोसेफ हूवर ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में पश्चिमी घाटों के 22 करोड़ लोगों के कल्याण की चिंता करती है, तो वह कस्तूरीरंगन समिति की कम से कम 85 प्रतिशत सिफारिशों को स्वीकार करेगी। अन्यथा यह लोगों की पीड़ा का कारण होगा।

 

कर्नाटक में मानित वन

  • राज्य सरकार की मानित (डीम्ड) वन क्षेत्र को 3,30,186 हेक्टेयर से घटाकर 2 लाख हेक्टेयर करने की योजना ने कर्नाटक में वन अतिक्रमण पर चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
  • राज्य विशेषज्ञ समिति ने 1997 में 10 लाख हेक्टेयर मानित वन क्षेत्र की पहचान की थी, जो वर्षों से सरकारों द्वारा लगातार संकुचित किया गया था।
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