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सरकार ने भारत में बांस चारकोल में निर्यात प्रतिबंध हटाया

बांस उद्योग यूपीएससी: प्रासंगिकता

  • जीएस 3: भारतीय अर्थव्यवस्था एवं नियोजन, संसाधनों का अभिनियोजन, वृद्धि, विकास एवं रोजगार से संबंधित मुद्दे।

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भारत में बांस उद्योग: संदर्भ

  • हाल ही में, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय ने सूचित किया है कि सरकार ने भारतीय बांस उद्योग में कच्चे बांस के इष्टतम उपयोग  तथा उच्च लाभप्रदता की सुविधा के लिए बांस चारकोल केनिर्यात प्रतिबंधको हटा दिया है

 

बांस का कोयला क्या है?

  • वैध स्रोतों से प्राप्त बांस से निर्मित बांस के समस्त चारकोल को निर्यात को अनुमति प्रदान की गई है, बशर्ते कि यह सिद्ध हो कि लकड़ी का कोयला बनाने के लिए उपयोग किया गया बांस वैध स्रोतों से प्राप्त किया गया है
  • अंतरराष्ट्रीय बाजार में बांस के चारकोल की भारी मांग है एवं सरकार द्वारा निर्यात प्रतिबंध हटाने से भारतीय बांस उद्योग इस अवसर का लाभ उठाने तथा विशाल वैश्विक मांग का दोहन करने में सक्षम होगा।
  • यह बांस के अपशिष्ट का इष्टतम उपयोग भी सुनिश्चित करेगा एवं इस प्रकार प्रधानमंत्री के “कचरे से धन” (बेस्ट टू वेल्थ) के दृष्टिकोण में योगदान देगा।

 

बांस उद्योग में मुद्दे

  • भारतीय बांस उद्योग, वर्तमान में, बांस के अपर्याप्त उपयोग के कारण अत्यधिक उच्च इनपुट लागत से जूझ रहा है।
  • भारत में, बांस का उपयोग अधिकांशतः अगरबत्ती के निर्माण में किया जाता है, जिसमें अधिकतम 16% बांस की छड़ें बनाने के लिए उपयोग किया जाता है, जबकि शेष 84% बांस पूर्ण रूप से बेकार है।
  • परिणाम स्वरूप, गोल बांस की छड़ियों के लिए बांस इनपुट लागत 25,000 रुपये से 40,000 रुपये प्रति मीट्रिक टन की सीमा में है, जबकि बांस की औसत लागत 4,000 रुपये से 5,000 रुपये प्रति मीट्रिक टन है।

 

बांस के लाभ 

  • पारिस्थितिक लाभ
    • यह जल का संरक्षण करता है एवं इसलिए हमारे देश के जल-तनावग्रस्त जिलों में भविष्य के लिए एक  मार्ग प्रदर्शित कर सकता है।
    • यह वातावरण से कार्बन पृथक्करण (ग्रीन हाउस गैसों) का कार्य कर सकता है एवं इस प्रकार  वैश्विक तापन को कम कर सकता है।
  • आर्थिक लाभ
    • यह सतत विकास एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
    • इसका उपयोग भोजन, लकड़ी के विकल्प, भवन तथा निर्माण सामग्री, हस्तशिल्प एवं कागज बनाने में भी किया जा सकता है।
    • यह किसानों के लिए स्वरोजगार उत्पन्न करता है, जिससे किसान की आय में वृद्धि होती है।
    • यह भारत सहित अनेक विकासशील देशों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। इसके बहुआयामी उपयोगों के कारण, इसे प्रायः गरीब आदमी की लकड़ी कहा जाता है।
  • सामाजिक लाभ
    • यह ग्रामीण लोगों के मध्य समानता सुनिश्चित करता है क्योंकि इससे महिलाओं तथा बेरोजगार व्यक्तियों के एक बड़े वर्ग को लाभ होता है।
    • बांस, ऐतिहासिक रूप से, अधिकांशतः आदिवासी क्षेत्रों में उगाया जाता है। बांस के उपयोग से आदिवासियों को मुख्यधारा की आबादी से जुड़ने में सहायता मिल सकती है एवं इस प्रकार वे समावेशी विकास का हिस्सा बन सकते हैं।

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बांस की खेती को सहायता प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • राष्ट्रीय बांस मिशन 2007 में प्रारंभ किया गया था। इसमें मुख्य रूप से बांस के प्रसार तथा खेती पर जोर दिया गया था। हालांकि, इस परियोजना को सीमित सफलता मिली क्योंकि इसने बांस के प्रसंस्करण, उत्पाद विकास तथा मूल्यवर्धन पर पर्याप्त ध्यान केंद्रित नहीं किया। इन सीमाओं को ध्यान में रखते हुए, 2018 में एक पुनर्गठित राष्ट्रीय बांस मिशन प्रारंभ किया गया था।
  • 2017 में, सरकार ने भारतीय वन (संशोधन) अधिनियम पारित किया एवं गैर-वन क्षेत्रों में बांस की कटाई, पारगमन तथा व्यापार पर प्रतिबंधों में छूट प्रदान की गई।
  • सरकार ने विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों में बांस की खेती का समर्थन करने के लिए बजट 2018 में 200 मिलियन डॉलर आवंटित किए।
  • तत्पश्चात सितंबर 2019 में वाणिज्य मंत्रालय ने अनिर्मित अगरबत्ती के आयात पर “प्रतिबंध” लगा दिया एवं जून 2020 में वित्त मंत्रालय ने गोल बांस की छड़ियों पर आयात शुल्क में वृद्धि कर दी

 

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