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मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने हेतु संयुक्त राष्ट्र अभिसमय

यूएनसीसीडी के बारे में

  • मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने हेतु संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (यूएनसीसीडी), 1994 में प्रतिष्ठित किया गया था।
  • यूएनसीसीडी पर्यावरण एवं विकास को सतत भूमि प्रबंधन से जोड़ने वाला विधिक रूप से बाध्यकारी एकमात्र अंतरराष्ट्रीय समझौता है।
  • अभिसमय विशेष रूप से शुष्क, अर्द्ध-शुष्क एवं शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों को संबोधित करता है, जिन्हें शुष्क भूमि के रूप में जाना जाता है।
  • नवीन यूएनसीसीडी 2018-2030 रणनीतिक ढांचा, भूमि क्षरण तटस्थता (एलडीएन) को प्राप्त करने हेतु सर्वाधिक विस्तृत वैश्विक प्रतिबद्धता है, ताकि अवक्रमित भूमि के वृहद विस्तार की उत्पादकता को पुनर्स्थापित किया जा सके, 1.3 बिलियन से अधिक लोगों की आजीविका में सुधार किया जा सके एवं संवेदनशील जनसंख्या पर सूखे के प्रभावों को कम किया जा सके।

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यूएनसीसीडी का इतिहास

  • 1977 में, मरुस्थलीकरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीओडी) ने मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए कार्य योजना (प्लान ऑफ एक्शन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन/पीएसीडी) को अपनाया।
  • इस तथा अन्य प्रयासों के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने 1991 में निष्कर्ष निकाला कि शुष्क, अर्ध-शुष्क एवं शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में भूमि क्षरण की समस्या और गहन हो गई है।
  • इसके परिणामस्वरूप, मरुस्थलीकरण से निपटने का प्रश्न अभी भी पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीईडी) के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय था, जो 1992 में रियो डी जेनेरियो में आयोजित किया गया था।
  • सम्मेलन ने समस्या के लिए एक नवीन, एकीकृत दृष्टिकोण का समर्थन किया, सामुदायिक स्तर पर सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए कार्रवाई पर बल दिया।
  • रियो सम्मेलन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा से जून 1994 तक विशेष रूप से अफ्रीका में मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने हेतु एक अभिसमय तैयार करने के लिए एक अंतर सरकारी वार्ता समिति (आईएनसीडी) स्थापित करने का आह्वान किया।
  • अभिसमय को 17 जून 1994 को पेरिस में अंगीकृत किया गया था एवं 50वें अनुसमर्थन के 90 दिन बाद 26 दिसंबर 1996 को प्रवर्तन में आया था।
  • पक्षकारों का सम्मेलन (सीओपी), जो अभिसमय का सर्वोच्च शासी निकाय है, ने अक्टूबर 1997 में रोम, इटली में अपना पहला सत्र आयोजित किया।

 

यूएनसीसीडी 2018-2030 रणनीतिक ढांचा

  • कुप्रभावित पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति में सुधार करने हेतु, मरुस्थलीकरण/भूमि क्षरण का मुकाबला करने हेतु,  सतत भूमि प्रबंधन को प्रोत्साहन देने हेतु एवं भूमि क्षरण तटस्थता योगदान देने हेतु।
  • प्रभावित आबादी के जीवन यापन की स्थितियों में सुधार लाना।
  • कमजोर आबादी एवं पारिस्थितिकी तंत्र की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए सूखे के प्रभावों को कम करने, अनुकूलित करने एवं प्रबंधित करने हेतु।
  • यूएनसीसीडी के प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से वैश्विक पर्यावरणीय लाभ उत्पन्न करना।
  • वैश्विक एवं राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी भागीदारी का निर्माण करके अभिसमय के कार्यान्वयन का समर्थन करने हेतु पर्याप्त एवं अतिरिक्त वित्तीय तथा गैर-वित्तीय संसाधन जुटाना।

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यूएनसीसीडी एवं भारत

  • भारत ने दिसंबर 1996 में यूएनसीसीडी अभिसमय का अनुसमर्थन किया।
  • 2019 में, भारत ने चीन से सीओपी का अध्यक्ष पद ग्रहण करके आगामी दो वर्षों के लिए 2021 तक सीओपी 14 की मेजबानी की
  • सीओपी 14 प्रथम अवसर था जब भारत ने यूएनसीसीडी सीओपी के एक संस्करण की मेजबानी की।
  • सम्‍मेलन की विषय वस्तु भूमि का जीर्णोद्धार, भविष्‍य को पुनः स्थापित रखना‘ (रिस्टोर लैंड, सस्टेन फ्यूचर) था।
  • भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जिन्होंने जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता एवं भूमि पर तीनों रियो अभिसमयों के सीओपी की मेजबानी की है।

 

यूएनसीसीडी  सीओपी 14: महत्वपूर्ण बिंदु

  • दिल्ली घोषणा: दिल्ली घोषणा भूमि क्षरण तटस्थता को प्राप्त करने के तरीके पर प्रत्येक देश द्वारा वैश्विक कार्रवाई का एक महत्वाकांक्षी विवरण है।
  • भूधृति में लैंगिक असमानता सहित भूधृति की असुरक्षा को दूर करने हेतु, भूमि से संबंधित कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए भूमि पुनर्स्थापना को प्रोत्साहन देना एवं देश-स्तर पर इन निर्णयों के कार्यान्वयन का समर्थन करने हेतु सार्वजनिक एवं निजी स्रोतों से वित्त के नवीन स्रोतों को जुटाने हेतु देशों ने प्रतिबद्धता व्यक्त की।

 

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