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भारत में शैल तंत्र भाग -2

भारत में शैल तंत्र

पिछले लेख में, हमने आर्कियन शैल तंत्र एवं पुराण शैल तंत्र पर चर्चा की है। हम इस लेख में अगले दो शैल तंत्रों पर चर्चा करेंगे।

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द्रविड़ शैल तंत्र

  • पुराजीवी (पैलियोज़ोइक) शैल निर्माण को भारत में द्रविड़ शैल तंत्र के रूप में जाना जाता है।
  • इन शैल तंत्रों का निर्माण पैलियोजोइक युग के दौरान अर्थात 600-300 मिलियन वर्ष पूर्व हुआ था।
  • विश्व में उच्च गुणवत्ता युक्त कोयले के निर्माण के कारण इसे कार्बोनिफेरस शैल तंत्र के रूप में भी जाना जाता है।
  • ये चट्टानें अधिकांशतः हिमालय के अतिरिक्त प्रायद्वीपीय क्षेत्रों एवं गंगा के मैदान में पाई जाती हैं तथा प्रायद्वीपीय ढाल में बहुत कम हैं।
  • यह वह अवधि है जब पैंजिया विखंडित हो गया था एवं टेथिस सागर अस्तित्व में आया था।
  • यह अवधि पृथ्वी की सतह पर जीवन के प्रारंभ का प्रतीक भी है।
  • द्रविड़ काल कोयला निर्माण का प्रारंभ था;  यद्यपि, ये संरचनाएं भारत में बहुतायत से नहीं पाई गईं।

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आर्यन शैल तंत्र

  • ऊपरी कार्बोनिफेरस काल के प्रारंभ को आर्यन समूह के रूप में जाना जाता है। चट्टानों के निर्माण के आर्य समूह को आगे निम्नलिखित समूहों में वर्गीकृत किया गया है।
    • ऊपरी पैलियोज़ोइक युग
    • मेसोजोइक युग
    • सेनोजोइक युग
    • नियोजोइक युग

 

आर्य संरचनाओं की मुख्य विशेषताएं

  • हिमालयी क्षेत्र में एक विशाल भूअभिनतियां (जिओ-सिंकलाइन) अध्यासित था जो टेथिस सागर से जुड़ा था।
  • कश्मीर हिमालय के क्षेत्र में उग्र ज्वालामुखी गतिविधि देखी गई।
  • गोंडवानालैंड के ऊपरी महाद्वीप में दरारें आ गईं और इसके टूटे हुए हिस्से एक दूसरे से दूर प्रवाहित होने लगे।
  • भारतीय उपमहाद्वीप यूरेशियन प्लेट से टकराने के लिए उत्तर एवं उत्तर-पूर्व की ओर प्रवाहित हो गया।
  • तृतीयक पर्वत निर्माण ने हिमालय को जन्म दिया।
  • विश्व के विभिन्न हिस्सों में मनुष्य का उद्विकास एवं प्रसार

 

गोंडवाना शैल तंत्र

  • गोंडवाना शैल तंत्र का नाम गोंड जनजाति (मुख्य रूप से तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश क्षेत्रों में पाए जाने वाले स्थानिक लोग) के नाम पर रखा गया है।
  • इस शैल तंत्र में उनके भीतर विशाल मात्रा में कार्बन निक्षेपित होता है, जो उन्हें भारत में कोयले का सर्वाधिक वृहद स्रोत बनाता है, जिसमें हमारे कोयले के भंडार का 98 प्रतिशत तक निक्षेपित होता है।
  • गोंडवाना क्रम की चट्टानें मुख्य रूप से रानीगंज, झारखंड के झरिया क्षेत्रों, दामोदर घाटी, छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश में पेंच घाटी, तेलंगाना में गोदावरी घाटी तथा पश्चिम बंगाल की राजमहल पहाड़ियों में पाई जाती हैं।

 

डेक्कन ट्रैप

  • दक्कन ट्रैप का गठन तब हुआ जब भारतीय प्लेट गोंडवाना प्लेट से टूटकर यूरेशियन प्लेट की ओर उत्तर की ओर प्रवाहित होते हुए हिंद महासागर में रीयूनियन हॉटस्पॉट के ऊपर आ गई
  • भारतीय प्लेट पर दरारों से मैग्मा के निरंतर उद्गार से दक्कन ट्रैप नामक एक स्तरित संरचना का निर्माण हुआ।
  • ये परत में संपिंडित शैल तंत्रों (चट्टान प्रणालियों)/ठंडा मैग्मा के ऊपर मैग्मा के प्रवाह से निर्मित होते हैं।
  • यह संरचना बेसाल्ट एवं डोलोराइट चट्टानों से निर्मित है।
  • ये चट्टानें अत्यंत कठोर हैं एवं इनके अपक्षय के परिणामस्वरूप काली मिट्टी का निर्माण हुआ है।

 

तृतीयक शैल तंत्र

  • ये चट्टानें सेनोजोइक युग से संबंधित हैं, जो लगभग 60 मिलियन वर्ष निर्मित हुई थी।
  • यह शैल तंत्र दो घटनाओं द्वारा अभिलक्षित किया जा सकता है:
    • प्राचीन गोंडवाना भूमि का अंतिम रूप से विखंडन, एवं
    • टेथिस भू-अभिनति (जियोसिंक्लाइन) या हिमालय का उत्थान
  • हिमालय पर्वत श्रृंखला निम्नलिखित काल अवधि में विकसित हुई है:
    • महान अथवा वृहद हिमालय का निर्माण ओलिगोसीन काल के दौरान हुआ था’
    • लघु हिमालय का निर्माण मध्य नूतन (मायोसीन) काल के दौरान हुआ था।
    • शिवालिकों का निर्माण अतिनूतन (प्लीयोसीन) एवं ऊपरी प्लायोसीन काल के दौरान हुआ था।
  • इस युग की चट्टानों में पेट्रोलियम एवं कोयले के अनेक मूल्यवान संसाधनों के निक्षेप प्रदर्शित हुए है।
  • तृतीयक अनुक्रम पूर्ण रूप से बंगाल एवं गंगा डेल्टा, पूर्वी तट तथा अंडमान द्वीप समूह में विस्तृत है।
  • भारत में तृतीयक अनुक्रम को सामुद्रिक तृतीयक अनुक्रम भी कहा जाता है।

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चतुर्थ महाकल्प शैल तंत्र

  • चतुर्थ महाकल्प का नाम बहुत हाल के निक्षेपों के लिए जाना जाता है, जिसमें जीवित प्रतिनिधियों के साथ प्रजातियों के जीवाश्म सम्मिलित हैं।
  • भारत-गंगा के मैदान में पाया जाने वाला जलोढ़ इसी युग से संबंधित है।
  • इसमें भारत के उत्तरी भागों में भारत-गंगा के मैदानों के हाल के समस्त जलोढ़ निक्षेप भी शामिल हैं।
  • इस शैल तंत्र के हिस्से के रूप में भांगर, खादर, करेवा का निर्माण हुआ था।

 

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