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भारत का भूवैज्ञानिक इतिहास
भारत का भूविज्ञान (भूगर्भ शास्त्र) अत्यंत विविध है क्योंकि भारत में मौजूद चट्टानें पृथक-पृथक भूगर्भिक काल से संबंधित हैं, जो कि इयोआर्कियाई महाकल्प के रूप में हैं। जबकि कुछ चट्टानें विरूपित एवं परिवर्तित हो गई हैं, अन्य निक्षेपों में हाल ही में निक्षेपित की गई जलोढ़ सम्मिलित है जिसे अभी तक प्रसंघनन (डायजेनेसिस) से गुजरना है।
भारत के भूवैज्ञानिक इतिहास की प्रमुख घटनाएं
- प्रायद्वीपीय भारत, भूपर्पटी के निर्माण के पश्चात से प्राचीन भूभाग का हिस्सा था।
- तृतीयक काल में हिमालय का प्रोत्थान।
- अति नूतन (प्लीस्टोसीन) काल के दौरान भारत-गंगा के मैदान का तलोच्चन गठन, जो नदियों के बाढ़ के मैदानों एवं गंगा के मैदान के निचले हिस्से में अवसादन के माध्यम से आज तक जारी है।
भारत में 4 प्रमुख शैल तंत्र
इस जटिल एवं विविध भूवैज्ञानिक इतिहास के आधार पर, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने देश के शैल तंत्र (रॉक सिस्टम) को 4 प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया है:
- आद्य (आर्कियन) शैल तंत्र
- पुराण शैल तंत्र
- द्रविड़ शैल तंत्र
- आर्यन शैल तंत्र
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आद्य (आर्कियन) शैल तंत्र
- ‘आर्कियन’ शब्द पृथ्वी की पर्पटी की सर्वाधिक प्राचीन चट्टानों को संदर्भित करता है।
- विवर्तनिक उद्विकास के आरंभिक चरण को आर्कियन युग में पृथ्वी की सतह की ऊपरी परत के शीतलन एवं घनीकरण से चिह्नित किया गया था।
- मैग्मा घनीकरण के कारण इनमें जीवाश्म अनुपस्थित होता है।
- यह चट्टान प्रणाली 5 अरब वर्ष प्राचीन है, जिसे कैम्ब्रियन पूर्व (प्री कैम्ब्रियन) काल भी कहा जाता है।
- यह विशेष रूप से प्रायद्वीप पर नीस एवं ग्रेनाइट के उद्भासन द्वारा दर्शाया गया है।
- आर्कियन प्रणाली की चट्टानें अधिकांशतः कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, झारखंड में छोटानागपुर पठार तथा राजस्थान के दक्षिणी-पूर्वी भाग में पाई जाती हैं।
- वे अरावली पहाड़ियों, दक्कन के पठार एवं भारत के उत्तर पूर्व में पाए जाते हैं।
- वे वृहद (ग्रेटर) हिमालय, जास्कर, लद्दाख और काराकोरम की ट्रांस-हिमालयी श्रृंखलाएं के साथ-साथ पर्वत शिखरों की आधारों में भी पाए जाते हैं।
- वे अन्य शैल तंत्रों के लिए आधार संकुल (बेसमेंट कॉम्प्लेक्स) अथवा नींव चट्टानों के रूप में कार्य करते हैं जो प्रायद्वीपीय भारत के दो तिहाई भाग को आच्छादित करते हैं।
- चट्टानों के आर्कियन समूह में दो प्रणालियां हैं:
- अचियान प्रणाली: ग्रेनाइट एवं नीस,
- धारवाड़ प्रणाली: प्रथम अवसादी चट्टानें
धारवाड़ शैल तंत्र
- इन चट्टानों का निर्माण आर्कियन प्रणाली की चट्टानों के अपरदन एवं अवसादन के पश्चात हुआ है।
- ये सर्वाधिक प्राचीन अवसादी चट्टानें हैं।
- इस प्रणाली की चट्टानें आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन चट्टानों में सभी प्रमुख धात्विक खनिज जैसे लोहा, सोना, मैंगनीज इत्यादि पाए जाते हैं।
पुराण शैल तंत्र
- कडप्पा एवं विंध्य शैल तंत्र को समेकित रूप से पुराण शैल तंत्र के रूप में जाना जाता है।
- वे आर्कियन एवं धारवाड़ चट्टानों के क्षरण तथा निक्षेपण से निर्मित हुए हैं।
- ये चट्टानें अधिकांशतः अवसादी प्रकृति की हैं।
कडप्पा शैल तंत्र
- इसका नाम कडप्पा चट्टानों के व्यापक पैमाने पर परिवर्धन के कारण, आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले के नाम पर रखा गया है।
- इनका निर्माण तब हुआ था जब अवसादी चट्टानें जैसे बलुआ पत्थर, चूना पत्थर इत्यादि एवं मृदा को अभिनतिक वलन/सिंक्लिनल फोल्ड (दो पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य) में निक्षेपित किया गया था।
- ये बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, संगमरमर एवं अभ्रक के निक्षेपों के लिए प्रसिद्ध हैं।
विंध्य शैल तंत्र
- इस शैल तंत्र का नाम विंध्य पर्वत के नाम पर रखा गया है।
- इस प्रणाली में प्राचीन अवसादी चट्टानें (4000 मीटर मोटी) सम्मिलित हैं, जो आर्कियन आधार पर अध्यारोपित हैं।
- यह संरचना गृह निर्माण में प्रयुक्त होने वाली चट्टानों के लिए प्रसिद्ध है। इस संरचना के लाल बलुआ पत्थर से सांची स्तूप, लाल किला, जामा मस्जिद इत्यादि का निर्माण किया गया है।
- यह धातु युक्त खनिजों से रहित है, किंतु बड़ी मात्रा में टिकाऊ पत्थर, सजावटी पत्थर, चूना पत्थर, शुद्ध कांच बनाने वाली रेत इत्यादि प्रदान करता है।
- विंध्य प्रणाली में हीरा धारण करने वाले क्षेत्र हैं जहां से पन्ना एवं गोलकुंडा हीरे का खनन किया गया है।
अपने आगामी लेख में हम द्रविड़ शैल तंत्र एवं आर्य शैल तंत्र पर चर्चा करेंगे।







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