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पारिस्थितिक पिरामिड: अर्थ एवं प्रकार

पारिस्थितिक पिरामिड यूपीएससी 

पारिस्थितिक पिरामिड क्या है?

  • पारिस्थितिक पिरामिड विभिन्न सजीवों के मध्य उनकी पारिस्थितिक स्थिति के आधार पर संबंधों को चित्रित करने हेतु एक आलेखीय प्रतिनिधित्व है।
  • पारिस्थितिक पिरामिड में विशिष्ट पोषी स्तरों को प्रदर्शित करने वाली अनेक क्षैतिज रेखाएं होती हैं।
  • यह चार्ल्स एल्टन, जी. एवलिन हचिंसन एवं रेमंड लिंडमैन जैसे प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के कारण अस्तित्व में आया।
  • इसके अनेक नाम हैं जैसे चार्ल्स एल्टन के नाम पर एल्टोनियन पिरामिड, ऊर्जा पिरामिड, पोषी पिरामिड तथा खाद्य पिरामिड।

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पारिस्थितिक पिरामिड  के प्रकार 

पारिस्थितिक पिरामिड तीन प्रकार के होते हैं।

  • संख्याओं का पिरामिड
  • बायोमास का पिरामिड
  • ऊर्जा का पिरामिड

 

संख्याओं का पिरामिड 

  • संख्याओं का पिरामिड प्रत्येक पोषी स्तर में उपस्थित विभिन्न प्रजातियों के व्यष्टियों की कुल संख्या का प्रतिनिधित्व करता है।
  • “संख्याओं का पिरामिड” शब्द 1972 में चार्ल्स एल्टन द्वारा निरूपित किया गया था।
  • संख्याओं का पिरामिड आकार के आधार पर उर्ध्वाधर एवं व्युत्क्रमित दोनों हो सकता है।
  • संख्याओं के पिरामिड की एक बड़ी कमी यह है कि सभी जीवों की संख्या की गणना करना अत्यंत कठिन है।
  • इस कारण से, संख्याओं का पिरामिड पारिस्थितिकी तंत्र की पोषी संरचना की सही तस्वीर का प्रतिनिधित्व नहीं करता है।

 

संख्याओं का ऊर्ध्वाधर पिरामिड

  • इस प्रकार के पिरामिड में व्यष्टियों की संख्या निम्न स्तर से उच्च पोषी स्तर तक घटती जाती है।
  • उदाहरण: घास भूमि पारिस्थितिकी तंत्र एवं तालाब पारिस्थितिकी तंत्र
  • पोषी संरचना: घास-टिड्डा-चूहे-सांप-बाज।

 

संख्याओं का व्युत्क्रमित पिरामिड

  • इस प्रकार के पिरामिड में व्यष्टियों की संख्या निचले स्तर से उच्च पोषी स्तर तक बढ़ जाती है।
  • उदाहरण: वृक्ष पारिस्थितिकी तंत्र।

 

बायोमास का पिरामिड 

  • बायोमास का पिरामिड एक विशिष्ट पोषी स्तर में जीवों की कुल द्रव्यमान को इंगित करता है।
    • बायोमास एक जीव या एक विशेष पोषी स्तर पर  अनेक जीवो में उपस्थित जैव सामग्री की प्रति इकाई क्षेत्र उत्पाद की मात्रा है।
    • एक निश्चित पोषी स्तर पर बायोमास की गणना पोषी स्तर के भीतर व्यक्तियों की संख्या को किसी विशेष क्षेत्र में किसी जीव के औसत द्रव्यमान से गुणा करके की जाती है।
  • यह पिरामिड संख्याओं के पिरामिड में आकार के अंतर की समस्या को दूर करता है क्योंकि एक पोषी स्तर पर सभी प्रकार के जीवों का वजन होता है।
  • प्रत्येक पोषी स्तर में एक निश्चित अवधि में जीवित सामग्री का एक निश्चित द्रव्यमान होता है जिसे खड़ी फसल कहा जाता है।
  • बायोमास सदैव पोषी स्तर में वृद्धि के साथ कम हो जाता है एवं बायोमास का लगभग 10% से 20% एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में स्थानांतरित हो जाता है।

 

बायोमास का ऊर्ध्वाधर पिरामिड 

  • बायोमास के ऊर्ध्वाधर पिरामिड का एक विस्तृत आधार होता है जिसमें मुख्य रूप से प्राथमिक उपभोक्ता होते हैं, छोटे पोषी स्तर शीर्ष पर स्थित होते हैं।
  • उत्पादकों (स्वपोषी) का बायोमास अधिकतम होता है। इसलिए इन्हें सबसे नीचे रखा जाता है। अगले पोषी स्तर अर्थात प्राथमिक उपभोक्ताओं का बायोमास उत्पादकों से कम होता है। अतः उन्हें स्वपोषी से ऊपर रखा जाता है। अगले उच्च पोषी स्तर अर्थात द्वितीयक उपभोक्ताओं का बायोमास प्राथमिक उपभोक्ताओं की तुलना में कम होता है। शीर्ष, उच्च पोषी स्तर में बायोमास की मात्रा बहुत कम होती है। इसलिए उन्हें सबसे ऊपर रखा गया है।
  • उदाहरण: स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र।

 

बायोमास का व्युत्क्रमित पिरामिड

  • बायोमास के एक व्युत्क्रमित पिरामिड में, पिरामिड का एक छोटा आधार होता है, जिसमें उपभोक्ता बायोमास, उत्पादक बायोमास की तुलना में अधिक होता है एवं पिरामिड एक उल्टा आकार ग्रहण करता है।
  • उदाहरण: जलीय पारिस्थितिकी तंत्र।
  • ऐसा इसलिए है क्योंकि उत्पादक छोटे पादप प्लवक (फाइटोप्लांकटन) होते हैं जो तेजी से बढ़ते एवं प्रजनन करते हैं।

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ऊर्जा का पिरामिड

  • पारिस्थितिक तंत्र के पोषी स्तरों की कार्यात्मक भूमिकाओं की तुलना करने के लिए ऊर्जा पिरामिड सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं।
  • एक ऊर्जा पिरामिड प्रत्येक पोषी स्तर पर ऊर्जा की मात्रा एवं एक पोषी स्तर से अगले पोषी स्तर तक ऊर्जा की हानि को प्रदर्शित करता है।
  • ऊर्जा का पिरामिड सदैव एक ऊर्ध्वाधर पिरामिड होता है क्योंकि यह उत्पादकों से उपभोक्ताओं तक ऊर्जा के प्रवाह को दर्शाता है।
  • ऊर्जा का पिरामिड ऊर्जा हस्तांतरण में विभिन्न जीवों द्वारा निभाई गई वास्तविक भूमिका को इंगित करता है।
  • ऊर्जा प्रवाह के प्रतिरूप को ऊष्मागतिकी (थर्मोडायनेमिक्स) के नियम के आधार पर वर्णित किया जा सकता है जिसमें कहा गया है कि ऊर्जा न तो निर्मित की जाती है एवं न ही नष्ट होती है, यह केवल एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरित होती है।

 

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