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संपादकीय विश्लेषण- मूल्य विकृतियों को सही करने का समय 

मूल्य विकृतियों को सही करने का समय- यूपीएससी परीक्षा के लिए प्रासंगिकता

  • जीएस पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था– आयोजना, संसाधनों का अभिनियोजन, वृद्धि, विकास एवं रोजगार से संबंधित मुद्दे।

संपादकीय विश्लेषण- मूल्य विकृतियों को सही करने का समय _40.1

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस से लेकर व्यापार की लागत कम करने तक

  • पेट्रोल, डीजल एवं गैस की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी के परिणामस्वरूप देश में व्यापार करने की लागत में वृद्धि हुई है। यह भारत में व्यापारिक सुगमता से और समझौता कर रहा है।

 

आर्थिक सुधार एवं व्यापारिक सुगमता 

  • सुधारों के प्रमुख उद्देश्यों में से एक अर्थव्यवस्था के पूर्व समय के अत्यधिक सूक्ष्म प्रबंधन द्वारा उत्पन्न विकृतियों को कम करना रहा है।
  • आंतरिक आर्थिक उदारीकरण एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तथा निवेश के लिए खुलेपन के साथ, एक मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था का उदय हुआ है।
  • व्यापारिक सुगमता में सुधार एक प्रमुख प्राथमिकता बनी हुई है। किंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण व्यवसाय करने की लागत है।

 

भारत में व्यवसाय करने की लागत के मुद्दे

  • सरकारी नीति प्रेरित मूल्य विकृतियां: मूल्य निर्धारण विकृतियां घरेलू मूल्यवर्धन एवं रोजगार सृजन के लिए प्रतिस्पर्धात्मक हानि का एक स्रोत बन गई हैं।
    • विनिर्माण एवं रोजगार सृजन में भारत की सापेक्षिक कमी का परिणाम है।
  • सरकार की नीति-प्रेरित मूल्य निर्धारण विकृतियों की उत्पत्ति: यह निम्नलिखित राजनीतिक आवश्यकता में निहित है-
    • नकदी की तंगी से जूझ रही सरकार के लिए संसाधनों को अभिनियोजित करने का मार्ग तलाशें।
    • प्रत्यक्ष सब्सिडी भुगतान के लिए धन की आवश्यकता के बिना क्षेत्र के भीतर क्रॉस-सब्सिडी के माध्यम से जरूरतमंद लोगों को सस्ती वस्तुएं एवं सेवाएं प्रदान करें।

 

विद्युत में मूल्य विकृति

  • बिजली की कीमत भी अत्यधिक विकृत है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा को प्रोत्साहित करने एवं अर्थव्यवस्था के वि-कार्बनीकरण (डीकार्बोनाइजेशन) के लिए संसाधन उत्पन्न करने हेतु कोयले पर 400 रुपए प्रति टन का उपकर लगाया गया था।
  • जब जीएसटी को प्रारंभ किया गया था, तो राज्यों की कर प्राप्तियों में कमी को पूरा करने के लिए इस उपकर से प्राप्तियों को अकस्मात परिवर्तित कर दिया गया था।
  • लगभग एक अरब टन कोयले की वर्तमान खपत से लगभग 40,000 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है।
    • इस अतिरिक्त लागत का लगभग दो-तिहाई विद्युत क्षेत्र द्वारा वहन किया जाता है।

 

विद्युत क्षेत्र में मूल्य विकृति का प्रभाव

  • चूंकि रेलवे अपनी लागत को पूरा करने के लिए यात्री किराए में वृद्धि करने में असमर्थ रहा है, इसलिए उन्हें माल भाड़े से यात्री यातायात को क्रॉस-सब्सिडी देने की आवश्यकता है।
  • इसलिए, वे कोयले को ताप विद्युत संयंत्रों तक ले जाने के लिए वास्तविक लागत से लगभग दोगुना शुल्क लेते हैं।
  • यह विकृति ताप विद्युत संयंत्रों के लिए कोयले की लागत में वृद्धि करती है एवं वितरण कंपनियों के लिए बिजली की कीमतों में और वृद्धि कर देती है।
  • बदले में, वे औद्योगिक उपयोगकर्ताओं के लिए उच्च प्रशुल्क आरोपित कर अधिकांश घरेलू उपभोग को क्रॉस-सब्सिडी प्रदान करते हैं।
  • इससे अन्य देशों में प्रतिस्पर्धियों की तुलना में औद्योगिक उत्पादन की लागत बढ़ जाती है।
  • प्रतिस्पर्धात्मकता के परिणामी हानि के परिणामस्वरूप अल्प विनिर्माण विकास एवं नौकरियों का निम्न सृजन होता है।

 

पेट्रोल, डीजल जैसे ऊर्जा ईंधनों में मूल्य विकृतियां

  • ऊर्जा आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था की मूलभूत आवश्यकता है एवं प्रतिस्पर्धा की कुंजी है।
  • इसकी मूल्य निर्धारण विकृतियां कठोर हैं। आरंभिक दिनों में, कारों को विलासिता की वस्तु माना जाता था  एवं पेट्रोल पर उच्च उत्पाद शुल्क आरोपित किया जाता था, किंतु परिवहन की आवश्यक जरूरतों के लिए इसे सस्ता बनाने के लिए डीजल पर उत्पाद शुल्क कम था।
  • पेट्रोल एवं डीजल के मध्य कीमतों में अंतर के कारण डीजल कारों तथा एसयूवी की आपूर्ति एवं उपयोग में वृद्धि हुई।
  • इस विकृति के कारण सरकार को धीरे-धीरे डीजल की कीमतों में वृद्धि करनी पड़ी। तब से मूल्य अंतर मामूली रहा है।
  • मूल्य विकृति का कारण: पेट्रोल तथा डीजल पर उच्च करों से सरकार को असाधारण रूप से प्राप्त बड़े राजस्व ने ऐसी निर्भरता उत्पन्न की कि इन्हें जीएसटी से बाहर रखा गया है।
    • हाल ही में, केंद्र सरकार कोविड-19 के वित्तीय प्रभाव को कम करने के लिए अतिरिक्त राजस्व जुटाने के लिए इन पर करों में वृद्धि कर रही है।
  • ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि का प्रभाव: इसने मुद्रास्फीति को संवेग प्रदान किया है।
    • वास्तविक प्रतिकूल प्रभाव वस्तुओं के सड़क परिवहन की लागत पर पड़ता है जो हमारे प्रतिस्पर्धियों की तुलना में रसद की लागत को लगभग दोगुना कर देता है।

 

व्यवसाय करने की कम लागत सुनिश्चित करना- आगे की राह 

  • नीति प्रेरित मूल्य विकृति को कम करना: सरकार की नीति-प्रेरित मूल्य निर्धारण विकृतियों को कम करने के लिए कार्रवाई की आवश्यकता है जो व्यवसाय करने की लागत में वृद्धि करती है।
  • राजनीतिक इच्छाशक्ति: व्यापार करने की लागत को कम करने के लिए आम सहमति एवं संचालन परिवर्तन के लिए नेतृत्व और राजनीतिक पूंजी के निवेश की आवश्यकता होगी।
  • पेट्रोल और डीजल को जीएसटी व्यवस्था के अंतर्गत लाना: इसलिए पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के तहत आने की आवश्यकता है। 28% की उच्चतम दर पर भी, पेट्रोल की कीमत लगभग 60 रुपये प्रति लीटर होगी।
    • इसके बाद सरकारी वित्त का प्रबंधन कैसे किया जाए, इस पर चर्चा होनी चाहिए।
  • भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना: भूमि उपयोग रूपांतरण एवं पुनर्विकास प्रक्रियाओं को उपयोगकर्ता के अनुकूल बनाने की आवश्यकता है।
    • सार्वजनिक प्रावधान एवं गुणवत्तापूर्ण आधारिक अवसंरचना के उन्नयन के साथ यह आपूर्ति पक्ष की बाधाओं को कम करेगा एवं वास्तविक रूप से कम कीमतों को कम करेगा।

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निजी निवेश को प्रोत्साहित करना-  आगे की राह 

  • केवल निजी निवेश ही हमारी युवा पीढ़ी के लिए रोजगार सृजित कर सकता है। सरकारी नौकरी एक मृगतृष्णा है।
  • जितनी जल्दी हम इसे महसूस करें तथा व्यवसाय करने की लागत को कम करने हेतु संभावित मार्गों  से जूझना प्रारंभ करें एवं निजी निवेश में वृद्धि करें जो रोजगार सृजित करता है।

 

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