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संपादकीय विश्लेषण-ड्राइंग ए लाइन

ड्राइंग ए लाइन- यूपीएससी परीक्षा हेतु प्रासंगिकता

  • जीएस पेपर 2: संघवाद- संघ एवं राज्यों के कार्य एवं उत्तरदायित्व, संघीय ढांचे से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ

संपादकीय विश्लेषण-ड्राइंग ए लाइन_40.1

ड्राइंग ए लाइन- संदर्भ

  • जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) में विधानसभा क्षेत्रों के पुनः मानचित्रण (रीमैपिंग) का प्रस्ताव रखा।
    इसने कश्मीर घाटी में क्षेत्रीय दलों के पूरे वर्ग को विक्षुब्ध कर दिया है। उनके विरोध के मूल में राजनीतिक सत्ता के जम्मू क्षेत्र में स्थानांतरित होने का डर है।

 

ड्राइंग ए लाइन- जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग

  • पृष्ठभूमि: जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग का गठन 6 मार्च, 2020 को जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के भाग V के प्रावधानों के तहत संसद अधिनियम के आधार पर किया गया था।
  • अधिदेश: जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग को सात अतिरिक्त विधानसभा क्षेत्रों को केंद्र शासित प्रदेश की 83 सदस्यीय विधानसभा के लिए पुनः आरेखण एवं चित्रित करने हेतु अधिदेशित किया गया था।

 

ड्राइंग ए लाइन- मुख्य अनुशंसा

  • अतिरिक्त निर्वाचन क्षेत्रों के लिए विचार किए गए कारक-
    • अपर्याप्त संचार एवं
    • अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अत्यधिक दूरी अथवा दुर्गम परिस्थितियों के कारण सार्वजनिक सुविधाओं का अभाव।
  • जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग ने जम्मू मेंछह अतिरिक्त विधानसभा क्षेत्रों 37 से 43 एवं घाटी में एक विधानसभा क्षेत्र 46 से 47 तक करने का सुझाव दिया है।
  • अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण:
    • जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग ने अनुसूचित जातियों (हिंदुओं) के लिए सात सीटें आरक्षित करने का सुझाव दिया है, जो मुख्य रूप से सांबा-कठुआ-जम्मू-उधमपुर क्षेत्र में निवास करती हैं।
    • आयोग ने प्रथम बार अनुसूचित जनजातियों के लिए भी पृथक रूप से नौ सीटें भी निर्धारित की हैं।
    • इससे राजौरी-पुंछ क्षेत्र को लाभ प्राप्त होने की संभावना है, जहाँ अनुसूचित जनजातियों, मुख्य रूप से गैर-कश्मीरी भाषी मुसलमानों की सर्वाधिक संख्या है।

 

ड्राइंग ए लाइन- संबद्ध सरोकार

  • स्थानीय राजनीतिक दलों द्वारा विरोध: जम्मू क्षेत्र में राजनीतिक सत्ता के स्थानांतरण ने राजनीतिक दलों को विरोध हेतु प्रेरित किया है।
    • विशेष रूप से तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य के दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठन एवं 2019 में इसकी विशेष संवैधानिक स्थिति के विवादास्पद उन्मूलन के बाद भय बढ़ गया है।
  • राजनीतिक सत्ता का स्थानांतरण: विधानसभा क्षेत्रों के प्रस्तावित पुनः मानचित्रण (रीमैपिंग) के परिणामस्वरूप राजनीतिक सत्ता मुस्लिम क्षेत्र से हिंदू क्षेत्र में स्थानांतरित हो सकती है।
  • जम्मू की हिस्सेदारी में वृद्धि: यह आवंटन कश्मीर आधारित दलों की कीमत पर जम्मू-आधारित दलों की चुनावी संभावनाओं को बढ़ाता हुआ प्रतीत होता है।
    • घाटी के दलों ने मसौदे को “अस्वीकार्य” एवं “विभाजनकारी” बताते हुए विरोध व्यक्त किया है एवं इसकी वैधता पर प्रश्न उठाया है।
  • संवैधानिक वैधता: परिसीमन के प्रयोग पर राष्ट्रीय रोक है एवं जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की वैधता को संवैधानिक चुनौती अभी भी सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है।

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ड्राइंग ए लाइन- निष्कर्ष

  • जम्मू-कश्मीर की राजनीति को पुनरुद्देशित करने हेतु जारी स्वेच्छाचारिता एवं अविवेकपूर्ण उपाय क्षणिक रूप से सफल प्रतीत हो सकते हैं, किंतु यह स्थायी मार्ग नहीं भी हो सकता है।
  • सरकार को जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा प्रदान करने के अंतिम लक्ष्य के साथ अधिक संवादों एवं समायोजन उपायों द्वारा संचालित एक लोकतांत्रिक मार्ग अपनाना चाहिए।
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