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भारतीय संविधान का आधारिक संरचना सिद्धांत
भारतीय संविधान का आधारिक संरचना सिद्धांत: सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अप्रैल, 1973 के अपने 703 पृष्ठ के केशवानंद भारती वाद के निर्णय में भारतीय संविधान की आधारिक संरचना सिद्धांत की व्याख्या की।
आधारिक संरचना सिद्धांत का प्रसंग
समाचार में
हाल ही में, भारत के मुख्य न्यायाधीश, डी. वाई. चंद्रचूड़ ने संविधान की ‘आधारिक संरचना‘ की तुलना नॉर्थ स्टार से की, जो एक अचूक मार्गदर्शक है, जो मार्ग प्रशस्त करता है है जब मार्ग जटिल प्रतीत होता है।
पृष्ठभूमि
भारत के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा हाल ही में दिए गए एक बयान के प्रत्युत्तर में आई है कि 40 वर्ष पूर्व 13 न्यायाधीशों की एक खंडपीठ द्वारा केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के वाद में 7:6 के साधारण बहुमत के फैसले के माध्यम से पेश किए गए आधारिक संरचना के सिद्धांत ने संसदीय संप्रभुता को कमजोर कर दिया था।
आधारिक संरचना सिद्धांत के बारे में
- आधारिक संरचना सिद्धांत भारतीय संविधान से जुड़े मूलभूत न्यायिक सिद्धांतों में से एक है।
- आधारिक संरचना का सिद्धांत मानता है कि भारतीय संविधान के लिए एक आधारिक संरचना है एवं
- भारत की संसद आधारिक संरचना में संशोधन नहीं कर सकती है।
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आधारिक संरचना सिद्धांत का महत्व
- आधारिक संरचना अथवा आधारिक ढांचे का सिद्धांत और कुछ नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए एक न्यायिक नवाचार है कि संशोधन की शक्ति का संसद द्वारा दुरुपयोग नहीं किया जाता है।
- विचार यह है कि भारत के संविधान की आधारिक विशेषताओं को इस सीमा तक परिवर्तित नहीं किया जाना चाहिए कि प्रक्रिया में संविधान की पहचान खो जाए।
भारतीय संविधान का आधारिक संरचना सिद्धांत
केशवानंद भारती खंडपीठ के विभिन्न न्यायाधीशों ने ‘आधारिक संरचना‘ का गठन करने के विभिन्न उदाहरण दिए। कुल मिलाकर, केशवानंद भारती के फैसले (24 अप्रैल, 1973) ने कहा कि:
- संसद संविधान के आधारिक ढांचे अथवा आवश्यक विशेषताओं को बदलने के लिए अपनी संवैधानिक शक्ति का उपयोग नहीं कर सकती है।
- संसद संविधान की रचना नहीं रह सकती एवं न ही उसकी स्वामी बन सकती है।
- संविधान की आधारिक संरचना या रूपरेखा इसकी जीवित आत्मा है, जो इस रचना के शरीर को धारण करती है।
- इसके अस्तित्व को रचना के किसी विशेष प्रावधान के लिए इंगित नहीं किया जा सकता है।
- यह संविधान की “आत्मा” है, जो कि प्रस्तावना में निहित मूल्यों से अटूट रूप से जुड़ी हुई है, जिसके बिना दस्तावेज़ एवं इसे पवित्र बनाने वाले विचार ध्वस्त हो जाएंगे।
- संविधान एक जीवित व्यवस्था है। किंतु जिस तरह एक जीवित, जैविक प्रणाली में, जैसे कि मानव शरीर, जहां विभिन्न अंगों का विकास एवं क्षय होता है, फिर भी प्रत्येक अंग के उचित कार्य के साथ मूलभूत संरचना या पैटर्न समान रहता है, उसी तरह एक संवैधानिक प्रणाली में भी मूलभूत संस्थागत पैटर्न बना रहता है, भले ही विभिन्न घटक भागों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो सकते हैं।
- इसके लिए एक प्रणाली की विशेषता है कि यह तब नष्ट हो जाती है जब इसका एक आवश्यक घटक भाग नष्ट हो जाता है।
आधारिक संरचना सिद्धांत पर ग्रेनविले ऑस्टिन के विचार
- ग्रनविले ऑस्टिन के ”लोकतांत्रिक संविधान की कार्यप्रणाली” (वर्किंग ऑफ ए डेमोक्रेटिक कांस्टीट्यूशन) में कहा गया है कि आधारिक संरचना सिद्धांत “उचित रूप से कहा जाता है कि यह भारत में संवैधानिक व्याख्या का आधार बन गया है“।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) के फैसले में आधारिक संरचना सिद्धांत पर सर्वोच्च न्यायालय के विचार
- राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग ( नेशनल जुडिशल अप्वाइंटमेंट कमीशन/एनजेएसी) के फैसले में संविधान पीठ ने आधारिक संरचना सिद्धांत के पीछे के सिद्धांत को समझाया जब उसने कहा कि “किसी चीज में बदलाव में उसका विनाश शामिल नहीं है”।
आधारिक संरचना सिद्धांत के अंतर्गत क्या आता है?
सर्वोच्चता सहित संविधान; संविधान का संघीय एवं धर्मनिरपेक्ष चरित्र; विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के मध्य शक्तियों का पृथक्करण; व्यक्ति की गरिमा; राष्ट्र की एकता एवं अखंडता; भारत की संप्रभुता; हमारी नीति का लोकतांत्रिक चरित्र; कल्याणकारी राज्य एवं समतावादी समाज; आधारिक संरचना सिद्धांत की अन्य आवश्यक विशेषताओं के मध्य विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था एवं पूजा की स्वतंत्रता तथा स्थिति और अवसर की समानता।
केशवानंद भारती वाद का कालक्रम
श्रीमती इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी (1971)
1971 के चुनावों में कुल 540 में से लगभग 350 सीटों के साथ ‘गरीबी हटाओ’ के लोकप्रिय नारे पर इंदिरा गांधी सरकार की विजय के लगभग तुरंत बाद केशवानंद भारती मामला सर्वोच्च न्यायालय के विचार में आया।
गोलकनाथ वाद निर्णय
- संवैधानिक संशोधनों की न्यायिक समीक्षा की शक्ति को बरकरार रखने वाले सर्वोच्च न्यायालय के गोलकनाथ के फैसले के तहत मुख्य रूप से स्मार्ट सरकार ने अनेक संवैधानिक संशोधन प्रस्तुत किए।
- 24वें संविधान संशोधन ने अनुच्छेद 13 को परिवर्तित कर दिया, एक ऐसा प्रावधान जो अधिदेशित करता है कि कोई भी ‘कानून’ मौलिक अधिकारों को छीन या कम नहीं कर सकता।
- गोलकनाथ के फैसले ने ‘संवैधानिक संशोधन’ को भी शामिल करने के लिए अनुच्छेद 13 (2) में ‘कानून’ शब्द की व्याख्या की थी।
24वां संविधान संशोधन अधिनियम
- संसद ने 24वें संशोधन के माध्यम से कहा कि एक संवैधानिक संशोधन को केवल इसलिए निरस्त नहीं किया जा सकता क्योंकि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
- इसने अनुच्छेद 368 को भी संशोधित किया, एक प्रावधान जो संवैधानिक संशोधनों से संबंधित था, संसद को संविधान के किसी भी अनुच्छेद को समाविष्ट करने, परिवर्तित करने अथवा निरस्त करने में सक्षम बनाने हेतु।
25वां संविधान संशोधन अधिनियम
- 25 वें संवैधानिक संशोधन ने समुदाय के भौतिक संसाधनों के वितरण एवं धन के संकेंद्रण को रोकने के लिए अनुच्छेद 39 (बी) एवं (सी) के तहत राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों को प्रवर्तित करने हेतु संविधान में अनुच्छेद 31 सी समाविष्ट किया।
- सरकार का उद्देश्य उद्योगों एवं समाजवादी उपायों के राष्ट्रीयकरण को सुविधाजनक बनाना था।
- संशोधन ने अधिदेशित किया कि इस उद्देश्य के साथ अधिनियमित कोई भी कानून इस आधार पर “शून्य” नहीं माना जा सकता है कि यह मौलिक अधिकारों के साथ असंगत था।
- अनुच्छेद 31 सी के उत्तरार्ध में कहा गया है कि ऐसा कानून न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर होगा।
- वास्तव में इस तरह के कानून को चुनौती देने वाली याचिका भी न्यायालय में दायर नहीं की जा सकती है।
- संक्षेप में, संशोधन ने निर्देशक सिद्धांतों को मौलिक अधिकारों एवं सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा पर प्रधानता दी।
24 अप्रैल, 1973 का केशवानंद भारती वाद का निर्णय
13 न्यायाधीशों की खंडपीठ ने संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति को बरकरार रखा, जब तक कि वह इसकी आधारिक संरचना या आवश्यक विशेषताओं के प्रति दृढ़ थी।
नोट: चौथा, 26वां संवैधानिक संशोधन, प्रिवी पर्स की समाप्ति पर, केशवानंद भारती के फैसले में न्यायालय द्वारा विचार नहीं किया गया था।
इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण मामला
- आधारिक संरचना अथवा आधारिक ढांचा सिद्धांत इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण वाद में केशवानंद भारती के फैसले को निरस्त करने के असफल प्रयास से बच गया था। यह मुख्य न्यायाधीश रे के नेतृत्व वाली 13 सदस्यीय खंडपीठ भी थी।
- यह तब काम आया जब इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण मामले में न्यायालय ने आपातकाल के दौरान पारित 39 वें संविधान संशोधन को हटा दिया, जिसने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव को न्यायिक समीक्षा से परे कर दिया।
मिनर्वा मिल्स वाद (1980)
- 1980 में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार पुनः संवैधानिक संशोधनों की न्यायिक समीक्षा को अनुरक्षित रखने एवं मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए मिनर्वा मिल्स चुनौती में 42वें संशोधन के लिए आधारिक संरचना सूत्र का उपयोग किया।
भारतीय संविधान की आधारिक संरचना सिद्धांत के बारे में प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
प्र. क्या सर्वोच्च न्यायालय ने मिनर्वा मिल्स वाद में आधारिक संरचना के सूत्र (बेसिक स्ट्रक्चर फॉर्मूले) का प्रयोग किया था?
उत्तर. 1980 में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार पुनः संवैधानिक संशोधनों की न्यायिक समीक्षा को अनुरक्षित रखने एवं मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए मिनर्वा मिल्स चुनौती में 42वें संशोधन के लिए आधारिक संरचना सूत्र का उपयोग किया।
प्र. आधारिक संरचना सिद्धांत की उत्पत्ति सर्वोच्च न्यायालय के किस वाद से हुई है?
उत्तर. सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अप्रैल, 1973 के अपने 703 पृष्ठ के केशवानंद भारती के फैसले में भारतीय संविधान के आधारिक संरचना सिद्धांत की व्याख्या की।
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