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संपादकीय विश्लेषण- मेकिंग बेल इंपॉसिबल

जमानत को असंभव बनाना- यूपीएससी परीक्षा के लिए प्रासंगिकता

  • जीएस पेपर 2: केंद्र एवं राज्यों द्वारा आबादी के कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं तथा इन योजनाओं का प्रदर्शन;
    • इन कमजोर वर्गों की सुरक्षा एवं बेहतरी के लिए गठित तंत्र, कानून, संस्थान तथा निकाय।

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मेकिंग बेल इंपॉसिबल चर्चा में क्यों है?

  • हाल ही में, विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ के वाद  में, सर्वोच्च न्यायालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम  (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्टPMLA) की संवैधानिकता को इस बात के प्रमाण के रूप में बरकरार रखा कि एडीएम जबलपुर की प्रतिच्छाया पुनः जीवित हो गई है।
  • जमानत दिए जाने का पुराना सिद्धांत एवं जेल के अपवाद होने के कारण इस निर्णय के साथ न्यायिक रूप से अंतिम संस्कार किया गया है। जमानत भी अब अपवाद नहीं है। यह असंभव है।

 

पीएमएलए के अंतर्गत जमानत से संबंधित प्रावधान

  • पीएमएलए की धारा 45: जमानत के लिए पात्र होने हेतु, गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायालय को यह विश्वास दिलाना होगा कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि वह प्रवर्तन निदेशालय (एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट/ईडी) द्वारा लाए गए मनी लॉन्ड्रिंग अपराधों के लिए दोषी नहीं है।
    • आरोपी पर यह सिद्ध करने की जिम्मेदारी होती है कि घटना घटित नहीं हुई थी। यदि वह ऐसा नहीं कर पाया तो वह जेल में ही दिन काटेगा।
  • न्यायिक अवलोकन: इस उच्च बाधा को उचित ठहराने के लिए, न्यायालय ने निकेश ताराचंद शाह बनाम भारत संघ (2017) में अपने निर्णय को पलट दिया।
    • उपरोक्त वाद में, सर्वोच्च न्यायालय ने ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ के अपराध को कम जघन्य मानने एवं इसलिए आतंकवादी तथा विघटनकारी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (टेररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज/TADA) के तहत ‘आतंकवाद’ से अलग अपराध मानने का निर्देश दिया था।
    • न्यायालय ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध उतना ही जघन्य है जितना कि एक आतंकवादी कृत्य एवं हमारे देश की संप्रभुता तथा अखंडता के लिए बहुत बड़ा खतरा है।
  • संबंधित चिंताएं:  सर्वोच्च न्यायालय ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया कि धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत, मनी लॉन्ड्रिंग में कॉपीराइट एवं ट्रेडमार्क, कला तथा पुरावशेष, प्रतिभूतियों, सूचना प्रौद्योगिकी, कंपनियों  एवं वायु तथा जल प्रदूषण के उल्लंघन से संबंधित अपराधों से संबंधित धन भी सम्मिलित है।
  • गोपनीयता:  न्यायालय ने यह भी घोषित किया कि प्रवर्तन निदेशालय को प्रवर्तन मामले की सूचना रिपोर्ट ( एनफोर्समेंट केस इनफॉरमेशन रिपोर्ट/ईसीआईआर) को आरोपी के साथ साझा करने की आवश्यकता नहीं है।
    • यह विचित्र है क्योंकि गोपनीयता की समान धारणा पुलिस एवं केंद्रीय जांच ब्यूरो जैसी एजेंसियों के समकक्ष दस्तावेजों (एफआईआर) पर लागू नहीं होती है।
    • ईसीआईआर में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा अपराध दर्ज करने का औचित्य निहित है। यद्यपि,  न्यायालय ने ईसीआईआर की तुलना एफआईआर से नहीं करने का फैसला किया।

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निष्कर्ष

  • जब किसी को पीएमएलए के तहत किसी अपराध के लिए गिरफ्तार किया जाता है, तो उसे ऐसा क्यों कहा जाता है, यह बताए बिना उसे लंबे समय तक कैद में रखा जाएगा एवं कोई भी  न्यायालय कभी भी उचित रूप से यह निष्कर्ष निकालने में सक्षम नहीं होगी कि व्यक्ति कानून के तहत जमानत का हकदार है जैसा कि अब है।

 

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