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भारत में जूट उद्योग, इतिहास, मुद्दे तथा सरकार द्वारा उठाए गए कदम

भारत में जूट उद्योग 150 साल पुराना है। भारतीय जूट मिल्स एसोसिएशन (आईजेएमए) के अनुसार, भारत में लगभग 93 जूट मिल हैं।कलकत्ता से 20 किलोमीटर उत्तर में रिशिरा में, भारत में पहली जूट मिल/फैक्ट्री 1854 में स्थापित की गई थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारत को एक धक्का लगा क्योंकि जूट उत्पादन क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा अभी भी बांगलादेश में ही था और जूट कारख़ानों का स्थान अभी भी भारत में था। जूट टेक्सटाइल उद्योग हाल ही में पूर्वी भारत, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की एक मुख्य क्षेत्र सेवा करने वाले क्षेत्रों में से एक के रूप में सामरिक हुआ है।

 

भारत में जूट उद्योग, संदर्भ

  • हाल ही में, पश्चिम बंगाल में जूट क्षेत्र एक व्यापक संकट का सामना कर रहा है, जिससे हजारों श्रमिकों  एवं कृषकों की आजीविका प्रभावित हो रही है।

जूट उद्योग से संबंधित हाल के मुद्दे 

अधिप्राप्ति/खरीद से संबंधित मुद्दे

  • इस क्षेत्र का हालिया मुद्दा उच्च लागत पर कच्चे जूट की अधिप्राप्ति है किंतु अंतिम उत्पाद उच्च दरों पर  विक्रय किया जा रहा है।
  • सरकार किसानों से एक निश्चित न्यूनतम समर्थन मूल्य (मिनिमम सपोर्ट प्राइस/MSP) पर कच्चा जूट खरीदती है, जो अंतिम उत्पाद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य से 700 रुपये अधिक पर मिल तक पहुंचता है।
  • कीमतों में यह अंतर मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि जूट मिलें किसानों से दूरी के कारण किसानों से सीधे तौर पर कच्चा माल नहीं खरीदती हैं। साथ ही खरीद की प्रक्रिया में भी समय लगता है।
  • इसके अतिरिक्त, एक भी किसान मिल की पूरी मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त जूट का उत्पादन नहीं करता है। यह बिचौलियों या व्यापारियों के लिए आश्रय स्थल प्रदान करता है जो फिर अनेक किसानों से कच्चा जूट खरीदते हैं तथा फिर मिलों के साथ इसका व्यापार करते हैं।

जलवायु

  • 2020 के चक्रवात अम्फन के परिणामस्वरूप जूट का उत्पादन कम हुआ।
  • कृषि लागत तथा मूल्य आयोग ( द कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट्स एंड प्राइसेज/CACP) ने बताया कि चक्रवात के कारण 2020-21 में निम्न गुणवत्ता के जूट के रेशे का उत्पादन किया गया था।
  • चक्रवात के स्थलावतरण से जलभराव की समस्या उत्पन्न हो गई है तथा किसानों को समय से पूर्व अपनी फसल काटनी पड़ी है।

जमाखोरी से जुड़े मुद्दे

  • इन मुद्दों के साथ-साथ किसानों से लेकर व्यापारियों तक- सभी स्तरों पर जमाखोरी हुई।

भारत में जूट उद्योग 

  • भारत जूट का सर्वाधिक वृहद उत्पादक है जिसके बाद बांग्लादेश एवं चीन का स्थान है।
  • जूट को स्वर्णिम रेशा (गोल्डन फाइबर) के रूप में भी जाना जाता है  एवं यह भारत में कपास के  पश्चात सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्योगों में से एक है।
  • यद्यपि, बांग्लादेश, क्षेत्रफल एवं व्यापार के मामले में सूची में सबसे ऊपर है क्योंकि यह वैश्विक जूट निर्यात का तीन-चौथाई हिस्सा गठित करता है, जबकि भारत का योगदान मात्र 7% है।
  • प्रमुख जूट उत्पादक राज्य पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम, आंध्र प्रदेश, मेघालय तथा त्रिपुरा हैं।
  • महत्वपूर्ण रूप से, भारत के कुल उत्पादन का 99% से अधिक पश्चिम बंगाल, बिहार एवं असम के पास है।

जूट के लिए आवश्यक जलवायविक स्थिति

  • जूट मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल एवं दक्षिण-पश्चिम बांग्लादेश द्वारा साझा किए गए डेल्टा में  तथा असम, मेघालय एवं त्रिपुरा के कुछ हिस्सों में उत्पादित किया जाता है।
  • यह 24 डिग्री सेल्सियस से 37 डिग्री सेल्सियस के मध्य उष्ण एवं आर्द्र जलवायु में वृद्धि करता है।
  • जूट  पूर्ण रूप से  जैव निम्नीकरणीय (बायोडिग्रेडेबल) तथा पुनर्चक्रण (रिसाइकिल) करने योग्य है एवं जलाए जाने पर जहरीली गैसों का उत्पादन नहीं करता है।
  • यह न केवल कार्बन डाइऑक्साइड की खपत करता है  तथा ऑक्सीजन को मुक्त करता है बल्कि फसल चक्रों में  उत्पादित किए जाने पर मृदा की उर्वरता में भी वृद्धि करता है

विभाजन के बाद जूट उद्योग

  • इससे पूर्व, कलकत्ता मिल्स 1910 में  विश्व की सर्वाधिक वृहद जूट उत्पादक बन गई थी, जिसने 300,000 से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान किया था।
  • साथ ही, क्रीमिया युद्ध के दौरान तथा युद्ध के पश्चात प्रथम विश्व युद्ध में, जूट सैन्य कार्यों में उपयोगी पाया गया तथा बढ़ती मांग ने बंगाल को इस पर अपना एकाधिकार स्थापित करने में सहायता प्रदान की।
  • 1947 में पश्चिम बंगाल तथा पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में बंगाल के विभाजन के साथ, जूट उत्पादन करने वाली 75% से अधिक भूमि पूर्वी पाकिस्तान में चली गई, जिससे भारतीय जूट उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ।

 

जूट उद्योग के लिए सरकार की पहल

  • जूट पैकेजिंग सामग्री अधिनियम, 1987: जूट पैकेजिंग सामग्री (पैकिंग वस्तुओं में अनिवार्य उपयोग) अधिनियम, 1987 के प्रावधानों ने खाद्यान्न के 100% उत्पादन एवं चीनी उत्पादन के  20% को जूट बैग में पैक करना अनिवार्य कर दिया।
  • जूट स्मार्ट: 2016 में जूट क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए जूट स्मार्ट का विमोचन किया गया था।
  • जूट जियो-टेक्सटाइल के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
    • जूट भू-वस्त्र (JGT) को विशेष उपचार तथा बुनाई प्रक्रियाओं के माध्यम से निर्मित किया जा सकता है। जूट भू-वस्त्र को मृदा अपरदन के नियंत्रण, सिविल इंजीनियरिंग, नदी के तट की सुरक्षा एवं सड़क फुटपाथ निर्माण सहित कई क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है।
  • विभिन्न क्षेत्रों जैसे ऑटोमोबाइल, सड़क, निर्माण इत्यादि में जूट के उपयोग के लिए अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • नवीन अपगलन तकनीक विकसित की गई है और उसका परीक्षण किया जा रहा है।
  • जूट उद्योग के आधुनिकीकरण के प्रयास किए जा रहे हैं।
  • राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन/एनआईडी) के माध्यम से व्यापक स्तर पर जूट फाइबर के नए उपयोगों का पता लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
  • घरेलू उपभोग के साथ-साथ निर्यात के लिए जूट विविध उत्पादों (जेडीपी) को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • जूट प्रौद्योगिकी मिशन: जूट प्रौद्योगिकी मिशन राष्ट्रीय जूट नीति का एक प्रमुख घटक रहा है एवं जूट क्षेत्र में विविध कार्यक्रमों के कार्यान्वयन का माध्यम है।
 
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FAQs

भारत में जूट उद्योग क्या है?

जूट उद्योग भारत में जूट के उत्पादन, प्रसंस्करण और व्यापार से जुड़ा उद्यम है। यह उद्योग मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित है और देश में विभिन्न जूट मिलों के द्वारा निर्मित उत्पादों को उत्पन्न करता है।

भारत में कितने जूट मिल हैं?

भारत में लगभग 93 जूट मिलें हैं जो जूट के उत्पादन का कार्य करती हैं। इन मिलों में जूट को प्रसंस्कृत किया जाता है और उसे विभिन्न जूट उत्पादों में बदला जाता है।

जूट उद्योग के लिए भारत का महत्व क्या है?

जूट उद्योग भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश के अर्थव्यवस्था में रोजगार और आय का महत्वपूर्ण स्रोत है। इसके साथ ही, जूट उत्पादों का निर्यात भी देश के विदेशी मुद्रा कमाने में मदद करता है।

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