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प्रासंगिकता
- जीएस 3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन।
बायोम का अर्थ
- एक बायोम एक विशिष्ट जलवायु के प्रति अनुकूलित वनस्पति एवं वन्य जीवन का एक विस्तृत समुदाय है।
- पांच प्रमुख प्रकार के बायोम: जलीय, घास का मैदान, वन, मरुस्थल एवं टुंड्रा हैं।
- यद्यपि, उपरोक्त में से कुछ बायोम को और अधिक विशिष्ट श्रेणियों, जैसे स्वच्छ जल, समुद्री, सवाना, उष्णकटिबंधीय वर्षावन, समशीतोष्ण वर्षावन एवं टैगा में विभाजित किया जा सकता है।
भारत के बायोम
- भारत में बायोम को मोटे तौर पर निम्नलिखित पांच श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
- उष्णकटिबंधीय सदाबहार एवं अर्ध-सदाबहार वन
- उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन
- उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन
- पर्वतीय वन
- तटीय एवं दलदली वन।
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उष्णकटिबंधीय सदाबहार एवं अर्ध-सदाबहार वन
अवस्थिति
- उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलान, उत्तर पूर्वी क्षेत्र की पहाड़ियों एवं अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह में पाए जाते हैं।
- वे उष्ण एवं आर्द्र क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहां वार्षिक वर्षा 200 सेमी से अधिक होती है तथा औसत वार्षिक तापमान 22 डिग्री सेल्सियस से ऊपर होता है।
विशेषताएं
- उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन अच्छी तरह से स्तरीकृत होते हैं, जिनकी परतें जमीन के करीब होती हैं एवं झाड़ियों तथा लताओं से ढकी होती हैं, जिनमें छोटे संरचित वृक्ष होते हैं एवं इसके बाद ऊंचे वृक्षों की एक विविधता पाई जाती है।
- इन वनों में वृक्ष 60 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई तक पहुंचते हैं।
- वृक्षों के पत्ते गिरने, फूलने एवं फलने का कोई निश्चित समय नहीं होता है। ऐसे में ये वन वर्ष भर हरे-भरे प्रतीत होते हैं।
प्रजाति
- इन वनों में पाई जाने वाली प्रजातियों में शीशम, महोगनी, ऐनी, आबनूस इत्यादि सम्मिलित हैं।
अर्ध सदाबहार वन
अवस्थिति
- अर्ध सदाबहार वन इन क्षेत्रों के कम वर्षा वाले भागों में पाए जाते हैं। ऐसे वनों में सदाबहार एवं आद्र पर्णपाती वृक्षों का मिश्रण होता है।
प्रजातियां
- मुख्य प्रजातियां सफेद देवदार, होलॉक एवं कैल हैं।
विशेषताएं
- अंग्रेज भारत में वनों के आर्थिक मूल्य से अवगत थे, इसलिए इन वनों का व्यापक पैमाने पर दोहन प्रारंभ किया गया था। वनों की संरचना में भी परिवर्तन किया गया। गढ़वाल एवं कुमाऊं में ओक के वनों को देवदार (चिर) से प्रतिस्थापित कर दिया गया था, जिनकी रेलवे लाइन बिछाने हेतु आवश्यकता थी।
- चाय, रबर और कॉफी के बागान प्रारंभ करने के लिए वनों को भी साफ किया गया । अंग्रेजों ने विनिर्माण गतिविधियों के लिए भी लकड़ी का इस्तेमाल किया क्योंकि यह गर्मी के एक अवरोधक (इन्सुलेटर) के रूप में कार्य करता है।
- इस प्रकार, वनों के संरक्षणात्मक उपयोग को व्यावसायिक उपयोग द्वारा प्रतिस्थापित किया गया।
उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन
- ये भारत में सर्वाधिक विस्तृत वन हैं।
- इन्हें मानसूनी वन भी कहा जाता है।
अवस्थिति
- वे उन क्षेत्रों में विस्तृत हैं जो 70-200 सेमी के मध्य वर्षा प्राप्त करते हैं। जल की उपलब्धता के आधार पर इन वनों को आगे आद्र एवं शुष्क पर्णपाती में विभाजित किया जाता है।
आद्र पर्णपाती वन
अवस्थिति
- आद्र पर्णपाती वन उन क्षेत्रों में सुस्पष्ट रूप से पाए जाते हैं जहां वर्षा 100-200 सेमी के मध्य होती है। ये वन उत्तर पूर्वी राज्यों में हिमालय की तलहटी, पश्चिमी घाट के पूर्वी ढलान एवं ओडिशा में पाए जाते हैं।
प्रजातियां
- सागौन, साल, शीशम, हुर्रा, महुआ, आंवला, सेमल, कुसुम एवं चंदन इत्यादि इन वनों की प्रमुख प्रजातियां हैं।
शुष्क पर्णपाती वन
अवस्थिति
- यह देश के विशाल क्षेत्रों को आच्छादित करता है, जहां वर्षा 70 -100 सेमी के मध्य होती है। अधिक आद्र सीमांतों पर, यह आद्र पर्णपाती वनों में, जबकि शुष्क सीमांतों पर कांटेदार वनों में परिवर्तित हो जाता है। ये वन प्रायद्वीप के वर्षा वाले क्षेत्रों एवं उत्तर प्रदेश एवं बिहार के मैदानी इलाकों में पाए जाते हैं।
प्रजातियां
- तेंदु, पलास, अमलतास, बेल, खैर, धुरा इत्यादि इन वनों के सामान्य वृक्ष हैं।
उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन
अवस्थिति
- उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहां 50 सेमी से कम वर्षा होती है। इनमें विभिन्न प्रकार की घास एवं झाड़ियाँ पाई जाती हैं।
- इसमें दक्षिण पश्चिम पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के अर्ध-शुष्क क्षेत्र सम्मिलित हैं।
विशेषताएं
- इन वनों में, पौधे वर्ष के अधिकांश भाग में पत्रहीन (पत्ती रहित) रहते हैं एवं झाड़ीदार वनस्पति की अभिव्यंजना देते हैं।
प्रजातियां
- बबूल, बेर एवं जंगली खजूर, खैर, नीम, खेजड़ी, पलास इत्यादि महत्वपूर्ण प्रजातियां पाई जाती हैं।
पर्वतीय वन
- पर्वतीय वनों को दो प्रकारों, उत्तरी पर्वतीय वन एवं दक्षिणी पर्वतीय वन में वर्गीकृत किया जा सकता है।
- हिमालय पर्वतमाला उष्णकटिबंधीय से टुंड्रा तक वनस्पतियों का एक क्रम प्रदर्शित करती है, जो ऊंचाई के साथ परिवर्तित होती हैं।
- पर्णपाती वन हिमालय की तलहटी में पाए जाते हैं।
- 1,000-2,000 मीटर की ऊंचाई के बीच आर्द्र शीतोष्ण प्रकार के वन पाए जाते हैं।
- 1,500-1,750 मीटर के बीच, इस क्षेत्र में चीड़ के वन भी अच्छी तरह से विकसित हैं, चीड़ पाइन एक बहुत ही उपयोगी व्यावसायिक वृक्ष के रूप में है।
- देवदार, एक अत्यधिक मूल्यवान स्थानिक प्रजाति, मुख्य रूप से हिमालय पर्वतमाला के पश्चिमी भाग में उगती है। देवदार एक टिकाऊ लकड़ी है जिसका उपयोग मुख्य रूप से विनिर्माण गतिविधियों में किया जाता है।
- इसी तरह, चिनार एवं अखरोट, जो कश्मीर के प्रसिद्ध हस्तशिल्प को बनाए रखते हैं, इस क्षेत्र से संबंधित हैं।
- ब्लू पाइन एवं स्प्रूस 2,225-3,048 मीटर की ऊंचाई पर दिखाई देते हैं। इस क्षेत्र में अनेक स्थानों पर समशीतोष्ण घास के मैदान भी पाए जाते हैं।
- सिल्वर फर, जुनिपर्स, पाइन, बर्च एवं रोडोडेंड्रोन इत्यादि 3,000-4,000 मीटर के मध्य पाए जाते हैं।
- गुज्जर, बकरवाल, भोटिया एवं गद्दी जैसी जनजातियों द्वारा इन चरागाहों का व्यापक रूप से पारगमन के लिए उपयोग किया जाता है।
- अधिक ऊंचाई पर, काई एवं लाइकेन टुंड्रा वनस्पति का हिस्सा बनते हैं।
- दक्षिणी पर्वतीय वनों में प्रायद्वीपीय भारत के तीन अलग-अलग क्षेत्रों; पश्चिमी घाट, विंध्य एवं नीलगिरी में पाए जाने वाले वन सम्मिलित हैं।
- समशीतोष्ण वनों को नीलगिरी, अन्नामलाई एवं पलानी पहाड़ियों में शोला कहा जाता है।
- आर्थिक महत्व के इस वन के कुछ अन्य वृक्षों में मैगनोलिया, लॉरेल, सिनकोना एवं वट्टल सम्मिलित हैं। ऐसे वन सतपुड़ा एवं मैकाल पर्वतमालाओं में भी पाए जाते हैं।
तटीय एवं दलदली वन
- मैंग्रोव समुद्र तटों के साथ लवणीय दलदली क्षेत्रों, ज्वार की खाड़ियों, पंकिल मैदानों ( कीचड़ युक्त भूमि) एवं ज्वारनदमुखों में उगते हैं।
- इनमें पौधों की अनेक लवण-सहिष्णु प्रजातियां सम्मिलित हैं। स्थिर जल (रुके हुए पानी) एवं ज्वार के प्रवाह की खाड़ियों से घिरे ये वन विभिन्न प्रकार के पक्षियों को आश्रय प्रदान करते हैं।
- भारत में, मैंग्रोव वन 6,740 वर्ग किमी में विस्तृत हैं जो विश्व के मैंग्रोव वनों का 7 प्रतिशत है।
- वे अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह एवं पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में अत्यधिक विकसित हैं। महत्व के अन्य क्षेत्र महानदी, गोदावरी एवं कृष्णा डेल्टा हैं







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