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अखिल भारतीय न्यायिक सेवाएं: प्रासंगिकता
- जीएस 2: विभिन्न अंगों, विवाद निवारण तंत्र एवं संस्थानों के मध्य शक्तियों का पृथक्करण।
अखिल भारतीय न्यायिक सेवाएं: प्रसंग
- हाल ही में, केंद्र सरकार ने अखिल भारतीय न्यायिक सेवा स्थापित करने के लिए राज्यों के साथ आम सहमति बनाने फिर तू नए सिरे से प्रयास करने का निर्णय लिया है।
एआईजेएस के बारे में
- स्वतंत्रता के शीघ्र पश्चात भारतीय प्रशासनिक सेवा एवं भारतीय पुलिस सेवा की तर्ज पर एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का प्रावधान किया गया था।
- 1976 में 42वें संशोधन के माध्यम से एआईजेएस के प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 312 में समाविष्ट किया गया था। किंतु इसके व्यापक स्वरूप पर निर्णय लेने हेतु अभी भी एक विधेयक की आवश्यकता होगी।
- एक प्रवेश परीक्षा के माध्यम से अधीनस्थ न्यायालयों के लिए अधिकारियों की भर्ती हेतु एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा स्थापित करने के लिए एक विधेयक की आवश्यकता हो सकती है।
किशोर न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015
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एआईजेएस के लाभ
- देश की समग्र न्याय वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करने हेतु एक उचित रूप से गठित अखिल भारतीय न्यायिक सेवा महत्वपूर्ण है।
- एआईजेएस एक उचित अखिल भारतीय योग्यता चयन प्रणाली के माध्यम से योग्य नई विधिक प्रतिभाओं को शामिल करने का अवसर प्रदान करेगा।
- यह समाज के उपेक्षित एवं वंचित वर्गों के लिए उपयुक्त प्रतिनिधित्व को सक्षम करके सामाजिक समावेशन के मुद्दे को भी हल करेगा।
- इस तरह की सेवा के गठन से प्रतिभाशाली व्यक्तियों का एक समूह निर्मित करने में सहायता प्राप्त होगीजो बाद में उच्च न्यायपालिका – 25 उच्च न्यायालयों एवं सर्वोच्च न्यायालय का हिस्सा बन सकते हैं।
- एआईजेएस के गठन से न्यायिक अधिकारियों की भर्ती पारदर्शी एवं कुशल हो जाएगी।
- यदि रिक्तियों को समय पर भरा जाता है, तो लंबित मामलों एवं मामलों के निस्तारण में विलम्ब की समस्या कम हो जाएगी।
एआईजेएस चुनौतियां
- संघीय ढांचे को कमजोर करना: एआईजेएस को संघीय ढांचे के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए एवं एआईजेएस निर्मित करते समय शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का पालन करना चाहिए।
- प्रस्ताव में कम वेतन एवं उच्च न्यायपालिका में पदोन्नत होने की कम संभावना सहित निचली न्यायपालिका को त्रस्त करने वाले संरचनात्मक मुद्दों को सम्मिलित नहीं किया गया है।
- परिनियोजित न्यायिक अधिकारी स्थानीय कानूनों एवं रीति-रिवाजों से अनभिज्ञ होंगे जो मामलों के न्याय निर्णयन करने में महत्वपूर्ण हैं, विशेष रूप से वैवाहिक या वसीयतनामा अथवा संपत्ति के मामलों जैसे सिविल मामलों में जहां अंतिम परिणाम स्थानीय रीति-रिवाजों द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
- एआईजेएस को प्रायः न्यायपालिका में रिक्त पदों के समाधान के रूप में देखा जाता है। यद्यपि, सभी राज्यों में रिक्तियों की संख्या एक समान नहीं है। इसके अतिरिक्त, अधिकांश रिक्तियां अधीनस्थ स्तर पर मौजूद हैं न कि जिला न्यायाधीशों के स्तर पर।
- देश भर में बहुत सारे कोचिंग संस्थान पनपने लगेंगे एवं, इसलिए सिविल सेवाओं के समान शिक्षा का व्यवसायीकरण किया जाएगा।






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