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संपादकीय विश्लेषण- प्रारूप विकलांगता नीति में गंभीर चूक

विकलांगता नीति के प्रारूप में गंभीर चूक- यूपीएससी परीक्षा के लिए प्रासंगिकता

  • जीएस पेपर 2: शासन, प्रशासन एवं चुनौतियां- केंद्र तथा राज्यों द्वारा आबादी के कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं एवं इन योजनाओं का प्रदर्शन।

संपादकीय विश्लेषण- प्रारूप विकलांगता नीति में गंभीर चूक -_3.1

समाचारों में प्रारूप विकलांगता नीति 

  • विकलांग व्यक्ति अधिकारिता विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ एंपावरमेंट ऑफ पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज/DoEPwD) ने हाल ही में विकलांग व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय नीति (“नीति”) का प्रारूप जारी किया।

 

प्रारूप विकलांगता नीति

  • आवश्यकता: 2006 की नीति को प्रतिस्थापित करने वाली एक नवीन नीति की आवश्यकता अनेक कारकों के कारण अनुभव की गई जैसे-
    • विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय पर भारत के द्वारा हस्ताक्षर;
    • एक नया विकलांगता कानून (विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016) का अधिनियमन जिसने विकलांगों के प्रकार की संख्या को सात शर्तों से बढ़ाकर 21 कर दिया एवं
    • विकलांग व्यक्तियों के एशियाई तथा प्रशांत दशक के लिए इंचियोन रणनीति का एक पक्ष होने के नाते, 2013-2022 (“इंचियोन प्रतिबद्धता”)।

 

इंचियोन रणनीति

  • इंचियोन रणनीति एशिया एवं प्रशांत हेतु संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक आयोग (यूनाइटेड नेशंस इकोनॉमिक एंड सोशल कमीशन फॉर एशिया एंड द पैसिफिक/यूएनईएससीएपी) के तत्वावधान में तैयार की गई थी।
  • इंचियोन रणनीति ने एशिया-प्रशांत देशों के लिए 10 लक्ष्यों का अभिनिर्धारण किया है ताकि विकलांग व्यक्तियों का समावेश एवं सशक्तिकरण सुनिश्चित किया जा सके तथा सतत विकास लक्ष्यों 2030 के अनुरूप हो।
  • इन प्रतिबद्धताओं ने व्यक्ति से समाज पर ध्यान केंद्रित करके, अर्थात विकलांगता के चिकित्सा प्रतिमान से विकलांगता के सामाजिक या मानवाधिकार प्रतिमान पर ध्यान केंद्रित करके विकलांगता के आसपास के विमर्श को परिवर्तित कर दिया है।

 

प्रारूप विकलांगता नीति

  • प्रारूप विकलांगता नीति के बारे में: प्रारूप नीति का सिद्धांत विकलांग व्यक्तियों के समावेश एवं सशक्तिकरण हेतु सरकार की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करना है जो एक तंत्र उपलब्ध कराता है जो समाज में उनकी पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित करता है।
  • प्रमुख विशेषताएं: नीति दस्तावेज शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास एवं रोजगार, खेल तथा संस्कृति, सामाजिक सुरक्षा, पहुंच एवं अन्य संस्थागत तंत्र के लिए एक विस्तृत प्रतिबद्धता पर प्रकाश डालता है।
  • सहयोग: दस्तावेज़ इस बिंदु पर बल देता है कि केंद्र एवं राज्य सरकारों को अन्य हितधारकों के साथ मिलकर कार्य करना चाहिए ताकि “उचित को वास्तविक बनाया जा सके”।

 

भारत में विकलांग व्यक्तियों की संबद्ध चिंताएं

  • विकलांग व्यक्तियों की राजनीतिक भागीदारी के अधिकार को मान्यता प्रदान करने में विफल: भारत की कोई नीतिगत प्रतिबद्धता नहीं है जिसका उद्देश्य विकलांग व्यक्तियों की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाना है।
    • इंचियोन लक्ष्य राजनीतिक प्रक्रियाओं एवं निर्णय निर्माण में भागीदारी को भी प्रोत्साहित करते हैं।
    • भारत में राजनीतिक दल अभी भी विकलांगों को विशेष रूप से उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु  व्यापक मतदाताओं के रूप में नहीं पाते हैं।
  • अभिगम्यता का मुद्दा: विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016 राजनीतिक डोमेन को मान्यता प्रदान करता है जिसमें विकलांग व्यक्तियों को उनके मानवाधिकारों तथा मौलिक स्वतंत्रता का अनुभव करने की अनुमति प्रदान की जानी चाहिए। यद्यपि, अप्राप्यता के विभिन्न उदाहरण हैं जैसे-
    • अनेक स्थानों पर प्रायः सुलभ मतदान केंद्रों की कमी होती है।
    • सभी मतदान केंद्रों पर अभी भी ब्रेल इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों एवं यहां तक ​​कि व्हीलचेयर सेवाओं का व्यापक रूप से अनुकूलन नहीं हुआ है।
    • भारत के निर्वाचन आयोग ने चुनावी प्रक्रिया के दौरान पीडब्ल्यूडी से निपटने के लिए अपनी प्रक्रिया विकसित की है।
    • प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में विकलांग व्यक्तियों की सही संख्या पर लाइव समग्र डेटा की कमी ही उनकी प्रभावहीनता में वृद्धि करती है।
    • पार्टी की बैठकों के लिए सुलभ स्थान की कमी, प्रचार के लिए अगम्य परिवहन या मतदाताओं एवं पार्टी नेताओं के  मध्य एक मनोवृत्ति बाधा को योगदान कारक कहा जा सकता है।
  • राजनीतिक बहिष्करण के उदाहरण: राजनीतिक स्थान से विकलांग व्यक्तियों का अपवर्जन देश में राजनीतिक प्रक्रिया के सभी स्तरों पर घटित होता है एवं विभिन्न रीतियों से, विकलांगों की प्रभावहीनता में वृद्धि करता है। उदाहरण के लिए-
    • मतदान प्रक्रिया की दुर्गमता,
    • दलगत राजनीति में भाग लेने में बाधाएं अथवा
    • स्थानीय, राज्य अथवा राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व की कमी।
  • अपर्याप्त प्रतिनिधित्व: विकलांग व्यक्तियों का शासन के तीनों स्तरों पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
    • इस लेखक द्वारा संसदीय कार्य मंत्रालय को क्रमस्थापन सूचना के अधिकार की प्रतिक्रिया से ज्ञात होता है कि सरकार सदस्यों के विकलांगता पहलू पर आंकड़े नहीं रखती है।
    • यद्यपि, कुछ राज्यों ने भागीदारी में वृद्धि करने हेतु स्थानीय स्तर पर पहल प्रारंभ कर दी है।
    • उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ ने प्रत्येक पंचायत में कम से कम एक विकलांग व्यक्ति को नामांकित करने की पहल आरंभ  की।
    • यदि कोई विकलांग व्यक्ति निर्वाचित नहीं होता है, तो उसे संबंधित कानून में परिवर्तन के अनुसार पंचायत सदस्य के रूप में नामित किया जाता है।

 

प्रारूप विकलांगता नीति- आगे की राह

  • नीति दस्तावेज का लक्ष्य – समावेशिता एवं सशक्तिकरण – राजनीतिक समावेश के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता है। नीति चार-आयामी दृष्टिकोण का पालन कर सकती है-
  • विकलांग व्यक्तियों के संगठनों की क्षमता का निर्माण एवं ‘निर्वाचन प्रणाली, सरकारी संरचना तथा बुनियादी संगठनात्मक  एवं पक्षपोषण कौशल में प्रशिक्षण के माध्यम से अपने सदस्यों को सशक्त बनाना’;
  • विकलांग व्यक्तियों की राजनीतिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सांसदों एवं निर्वाचन निकायों द्वारा  विधिक तथा नियामक ढांचे का निर्माण, संशोधन या अपसारण;
  • नागरिक समाजों को ‘घरेलू चुनाव अवलोकन अथवा मतदाता शिक्षा अभियान संचालित करने’ हेतु समावेशित करना; तथा
  • राजनीतिक दलों के लिए ‘चुनाव अभियान की रणनीतियां निर्मित करते समय एवं नीतिगत पदों को विकसित करते समय विकलांग व्यक्तियों के लिए एक सार्थक आउटरीच का संचालन’ करने हेतु एक रूपरेखा।

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प्रारूप विकलांगता नीति- निष्कर्ष

  • इस अधिकार को तभी वास्तविक बनाया जा सकता है जब इसमें राजनीतिक अधिकार/राजनीतिक भागीदारी सम्मिलित हो। यह केवल विकलांगता पर सार्वभौमिक सिद्धांत के अनुरूप होगा, अर्थात, “हमारे बारे में कुछ नहीं, हमारे बिना कुछ नहीं (नथिंग अबाउट अस विदाउट अस)।”

 

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