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मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 12-32) | धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)

स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22) – यूपीएससी परीक्षा के लिए प्राथमिकता

  • जीएस पेपर 2: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, उद्विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान एवं आधारिक संरचना।

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मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 12-35) – पृष्ठभूमि

  • मूल अधिकारों के बारे में: भारत के संविधान के अंतर्गत प्रत्याभूत मूल अधिकार अपनी प्रकृति में मौलिक हैं क्योंकि उन्हें देश की मूलभूत विधि के अंतर्गत सम्मिलित किया गया है।
    • अधिकारों का शाब्दिक अर्थ उन स्वतंत्रताओं से है जो व्यक्तिगत कल्याण के साथ-साथ संपूर्ण समुदाय के कल्याण  हेतु आवश्यक हैं।
    • मूल अधिकार (अनुच्छेद 12-35) जाति, धर्म, लिंग इत्यादि के आधार पर विभेद के बिना लागू होते हैं।
  • मूल अधिकारों का मुख्य अधिदेश: भारत में राजनीतिक लोकतंत्र के आदर्शों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से भारतीय संविधान में मूल अधिकार प्रदान किए गए हैं।
  • मूल अधिकारों के स्रोत: भारतीय संविधान के मूल अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) की उत्पत्ति अमेरिकी संविधान (संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकार विधेयक/ यूनाइटेड स्टेट्स बिल ऑफ राइट्स) से हुई है।

 

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 – 28): मुख्य बिंदु 

  • धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के बारे में: चूंकि भारत एक बहुल-धर्म वाला देश है, जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई एवं अनेक अन्य समुदाय एक साथ रहते हैं, संविधान भारत को एक ‘धर्मनिरपेक्ष राज्य’ घोषित करता है।
    • एक धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ है कि भारतीय राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है। किंतु यह समस्त नागरिकों को किसी भी धर्म में विश्वास रखने तथा अपनी पसंद के अनुसार उपासना करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करता है।
    • यह स्वतंत्रता संविधान द्वारा धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 25-28) के अंतर्गतत प्रदान की गई है।
  • महत्व: धर्म की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार राज्य को विदेशियों सहित नागरिकों की धार्मिक मान्यताओं  एवं उपासना के तरीकों में हस्तक्षेप करने से निवारित करता है।

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धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 – 28): प्रमुख प्रावधान

  • अंतःकरण की स्वतंत्रता एवं धर्म के अभ्यास तथा प्रचार-प्रसार की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25): सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता  एवं धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, आचरण करने  तथा प्रचार करने का समान अधिकार है। धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की निम्नलिखित सीमाएँ हैं-
    • कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को बल या प्रलोभन द्वारा अपना धर्म परिवर्तित करने हेतु बाध्य कर सकता है।
    • कुछ अमानवीय, अवैध एवं अंधविश्वासी प्रथाओं पर प्रतिबंध आरोपित कर दिया गया है।
    • देवी-देवताओं अथवा कुछ अलौकिक शक्तियों को अर्पित करने हेतु पशुओं अथवा मनुष्यों की बलि देने जैसी धार्मिक प्रथाओं की अनुमति नहीं है।
    • इसी तरह, कानून एक विधवा को सती प्रथा के नाम पर अपने मृत पति (स्वेच्छा से या जबरन) के साथ रहने हेतु स्वयं के अंतिम संस्कार करने की अनुमति नहीं देता है।
    • उपरोक्त प्रतिबंधों के अतिरिक्त, राज्य को धर्म से संबंधित किसी भी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को विनियमित करने की शक्ति भी प्राप्त है।
    • राज्य इस अधिकार पर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता तथा स्वास्थ्य के आधार पर प्रतिबंध भी आरोपित कर सकता है।
  • धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 26): सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार/नैतिकता एवं स्वास्थ्य के अधीन, प्रत्येक धार्मिक समूह अथवा उसके किसी भी वर्ग को अधिकार होगा-
    • धार्मिक एवं धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए संस्थानों की स्थापना तथा रखरखाव करना;
    • धर्म के मामलों में अपने मामलों का प्रबंधन करने हेतु;
    • चल तथा अचल संपत्ति का स्वामित्व एवं अधिग्रहण; तथा
    • ऐसी संपत्ति का कानून के अनुसार प्रशासन करना।
  • किसी विशेष धर्म के प्रचार के लिए करों के भुगतान के बारे में स्वतंत्रता (अनुच्छेद 27): किसी भी व्यक्ति को किसी भी कर का भुगतान करने हेतु बाध्य नहीं किया जाएगा, जिसकी आय विशेष रूप से किसी विशेष धर्म  या धार्मिक संप्रदाय के प्रचार या रखरखाव पर किए गए व्ययों के भुगतान में उपयोग की जाती है।
  • कुछ शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक पूजा में उपस्थिति के बारे में स्वतंत्रता (अनुच्छेद 28): राज्य के धन से पूरी तरह से स्थापित किए गए किसी भी शैक्षणिक संस्थान में कोई धार्मिक शिक्षा/निर्देश प्रदान नहीं किया जाएगा। यह राज्य पर निम्नलिखित सीमाएँ निर्धारित करता है-
    • यह उस शैक्षणिक संस्थान पर लागू नहीं होगा जो राज्य द्वारा प्रशासित है किंतु किसी भी न्यास के अंतर्गत स्थापित किया गया है जिसके लिए ऐसी संस्था में धार्मिक शिक्षा दी जानी अपेक्षित है।
    • किंतु ऐसी संस्था में जाने वाले किसी भी व्यक्ति को वहां दी जाने वाली किसी भी धार्मिक शिक्षा में भाग लेने  अथवा वहां आयोजित होने वाली किसी भी धार्मिक उपासना में सम्मिलित होने हेतु बाध्य नहीं किया जाएगा।
    • अवयस्क के मामले में, ऐसी गतिविधियों में भाग लेने के लिए उसके अभिभावक की सहमति आवश्यक है।

 

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