Correct option is B
परिचय:
यह प्रश्न
आनन्दवर्धन रचित
'ध्वन्यालोक' ग्रन्थ के
प्रथम उद्योत से संबंधित है, जहाँ
ध्वनि के स्वरूप को सिद्ध करते हुए उसके विरोधी मतों का खण्डन किया गया है।
व्याख्या:
सही विकल्प
(b) a-iii, b-ii, c-i, d-iv है।
यहाँ प्रत्येक युग्म की सही व्याख्या और उसका संदर्भ दिया गया है:
| सूची-I (कथन) |
सूची-II (सही मिलान) |
सन्दर्भ/स्पष्टीकरण (ध्वन्यालोक के अनुसार) |
| a. ध्वनिसंज्ञितं काव्यात्मानं गुणवृत्तिरित्याहुः। |
iii. भाक्तमाहुः |
जो आचार्य (मुख्यतः भट्टनायक के पूर्ववर्ती) ध्वनि को काव्य की आत्मा नहीं मानते, वे उसे लक्षणा (यानी गुणवृत्ति) अथवा भक्ति कहते हैं। अतः वे ध्वनि को भाक्त (लक्षणा पर आधारित) कहते हैं। |
| b. यत्रार्थो वाच्यविशेषः वाचकविशेषः शब्दो वा तमर्थ व्यंक्तः। |
ii. ध्वनिरिति |
यह आनन्दवर्धन द्वारा दिया गया ध्वनि का सर्वमान्य लक्षण है। इसका अर्थ है: "जहाँ अर्थ (वाच्य), वाचक शब्द, अथवा दोनों (विशेष प्रकार के) किसी अन्य अर्थ को व्यक्त करते हैं, वही ध्वनि है।" |
| c. कामनीयकमनतिवर्तमानस्य तस्योक्तालंकारादिप्रकारेष्वन्तभार्वः। |
i. असमीचीनम् |
इस कथन का अर्थ है: "उस (ध्वनि) के सौंदर्य को न लाँघते हुए, उसका उक्त अलंकार आदि के प्रकारों में समावेश हो जाता है।" ध्वनि विरोधी, जैसे अभिनवगुप्त के अनुसार 'अन्तर्भाववादी' (तृतीय अभावविकल्प), इसे अलंकार या गुण में समाविष्ट मानते हैं। परन्तु, ध्वन्यालोक इस मत को असमीचीन (अनुचित/गलत) सिद्ध करता है। |
| d. तस्माद्भक्तिरलक्षणम्। |
iv. ध्वनिप्रभेदो न |
इस कथन का अर्थ है: "इसलिए भक्ति (लक्षणा) ध्वनि का लक्षण (परिभाषा) नहीं है।" ध्वनिवादी (आनन्दवर्धन) स्पष्ट करते हैं कि भक्ति (लक्षणा) ध्वनि का लक्षण नहीं हो सकती, अपितु वह ध्वनि का एक भेद भी नहीं है। ध्वनि लक्षणा से भिन्न है। |
· (a) ध्वनि को 'भक्ति' मानने वाले आचार्य मानते हैं कि जहाँ मुख्य अर्थ बाधित हो, वहीं पर लक्षणा द्वारा ध्वनि होती है।
· (b) यह परिभाषा ध्वनि के व्यञ्जना व्यापार पर आधारित है, जिसे 'ध्वनि' नाम दिया गया है।
· (c) आनन्दवर्धन सिद्ध करते हैं कि ध्वनि का चमत्कार अलंकार या गुण से अतिरिक्त होता है, इसलिए उसका उनमें अन्तर्भाव करना गलत है।
· (d) ध्वनि को लक्षणा का भेद मानने से ध्वनि की पृथक् सत्ता समाप्त हो जाती है, जो ध्वन्यालोक को स्वीकार्य नहीं है।