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अधोलिखितं कथनद्वयमाश्रित्य समुचितमुत्तरं चिनुत कथनम् I : सर्वेष्वर्थविवादेषु बलवत्युत्तरा क्रिया। कथनम् II : आधौ प्रतिग्रहे द्यूते पूर्वा क्रिया
Question

अधोलिखितं कथनद्वयमाश्रित्य समुचितमुत्तरं चिनुत
कथनम् I : सर्वेष्वर्थविवादेषु बलवत्युत्तरा क्रिया।
कथनम् II : आधौ प्रतिग्रहे द्यूते पूर्वा क्रिया बलवत्तरा।
समुचितं विकल्पं चिनुत

A.

I & II उभे अपि सत्ये

B.

I & II उभे अपि असत्ये

C.

I सत्यम् परन्तु II असत्यम्

D.

I असत्यम् परन्तु II सत्यम्

Correct option is C


परिचय: यह प्रश्न याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार, किसी विवाद (अर्थविवाद/मुकदमा) में क्रिया (साक्ष्य, सबूत या गवाही) की प्रामाणिकता के सिद्धांत से संबंधित है।
व्याख्या:
सही विकल्प (c) I सत्यम् परन्तु II असत्यम् है।
कथन I: सर्वेष्वर्थविवादेषु बलवत्युत्तरा क्रिया। (सत्य) · अर्थ: सभी अर्थविवादों (धन, संपत्ति, भूमि आदि से संबंधित विवादों) में, उत्तरा क्रिया (उत्तर पक्ष, अर्थात् प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत किया गया साक्ष्य/सबूत) बलवान (अधिक विश्वसनीय) होता है।
· आधार: यह सिद्धांत वसिष्ठ और नारद स्मृति जैसे धर्मशास्त्र ग्रंथों पर आधारित है। इसका अर्थ यह है कि, जब तक आदि (अभियोगी/वादी) अपने दावे को सशक्त प्रमाणों से सिद्ध नहीं करता, तब तक प्रतिवादी का साक्ष्य या उसका इनकार (क्रिया) अधिक मान्य होता है।
· निष्कर्ष: यह कथन सत्य है।
रोचक तथ्य:
कथन II: आधौ प्रतिग्रहे द्यूते पूर्वा क्रिया बलवत्तरा। (असत्य) · अर्थ: इस कथन के अनुसार, आधि (गिरवी रखना), प्रतिग्रह (दान लेना) और द्यूत (जुआ) जैसे मामलों में पूर्वा क्रिया (पूर्व पक्ष, अर्थात् अभियोगी/वादी द्वारा प्रस्तुत किया गया साक्ष्य) बलवान होता है।
· यथार्थता: धर्मशास्त्र के अनुसार, आधि (गिरवी), प्रतिग्रह (दान), क्रय (खरीदना) आदि शीघ्र निष्पादित होने वाले मामलों में, पूर्वा क्रिया (अभियोगी का प्रमाण) नहीं, बल्कि लेख्य (दस्तावेजी प्रमाण) या उत्तरा क्रिया बलवान होती है।
· सही नियम: वास्तव में, जो कथन II में दिए गए हैं, वे उन अपवाद मामलों में शामिल होते हैं जहाँ पूर्वा क्रिया बलवती नहीं होती।
· मनुस्मृति/याज्ञवल्क्य स्मृति के नियम में, जिन मामलों में उत्तरा क्रिया बलवती नहीं होती, वे हैं: ऋण, निधि (खजाना), साहस (हिंसा), और स्त्री-संग्रह (विवाह/सम्बन्ध)। इन मामलों में पूर्वा क्रिया बलवती हो सकती है।
· कथन II में उल्लिखित 'आधि', 'प्रतिग्रह' और 'द्यूत' ऐसे मामले हैं जहाँ साक्ष्य के रूप में लेख्य (दस्तावेज) और उपभोग (भोग) को अधिक महत्त्व दिया जाता है, और ये सामान्य नियम ( उत्तरा क्रिया बलवती) के अपवाद नहीं होते, जहाँ पूर्वा क्रिया सीधे बलवती हो जाए। यह कथन धर्मशास्त्र के साक्ष्य नियम का सही प्रतिनिधित्व नहीं करता।
· निष्कर्ष: यह कथन असत्य है।

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