Correct option is C
परिचय: वाक्यार्थ (वाक्य का अर्थ) क्या है और वह कैसे निष्पन्न होता है, इस पर मीमांसा दर्शन में दो प्रमुख मत हैं: अभिहितान्वयवाद (भट्ट मत) और अन्विताभिधानवाद (गुरु मत)। यह प्रश्न अन्विताभिधानवाद से संबंधित है।
व्याख्या:
सही उत्तर (c) I सत्यम् परन्तु II असत्यम् है।
कथन I का विश्लेषण (सत्य) कथन I: आकांक्षायोग्यतासन्निधिवशाद्वक्ष्यमाणस्वरूपाणां पदार्थानां समन्वये तात्पर्यार्थो विशेषवपुः पदार्थोऽपि वाक्यार्थः समुल्लसतीति।
· यह कथन सत्य है।
· यह कथन अभिहितान्वयवाद का सार है। इस मत के अनुसार:
· पहले, वाक्य में प्रयुक्त पदों से उनके पदार्थों (अर्थों) का अभिधान (स्मरण/बोध) होता है।
· फिर, इन अभिहित (स्मृत) पदार्थों का परस्पर आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि के कारण समन्वय (अन्वय) होता है।
· इस समन्वय से उत्पन्न तात्पर्यार्थ (जिस विशेष अर्थ को वक्ता कहना चाहता है) ही वाक्यार्थ (विशेष वपुः पदार्थ) के रूप में अभिव्यक्त होता है।
· उदाहरण: 'देवदत्त गामानय' (देवदत्त गाय को लाओ) में, 'आकांक्षा' आदि के बल पर ही गाय, लाना और देवदत्त के बीच अन्वय होकर पूर्ण वाक्यार्थ प्राप्त होता है।
कथन II का विश्लेषण (असत्य) कथन II: मतमिदम् अन्विताभिधानवादिसम्मतम्।
· यह कथन असत्य है।
· कथन I में वर्णित मत (जहाँ पहले पद से पदार्थ का अभिधान होता है, फिर उनका अन्वय) भट्ट मत या अभिहितान्वयवाद कहलाता है।
· अन्विताभिधानवाद (प्रभाकर/गुरु मत) इसके विपरीत यह मानता है कि पद अपने अर्थ का बोध कराते समय ही उसे अन्य पदों के अर्थ से अन्वित (जुड़ा हुआ) रूप में बताते हैं। अर्थात्, पद से अर्थ का बोध अन्वित रूप में ही होता है, अलग-अलग अभिहित होकर नहीं।
अतः, कथन I (अभिहितान्वयवाद का स्वरूप) सही है, जबकि कथन II इसे गलत सम्प्रदाय (अन्विताभिधानवाद) से जोड़ता है।