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तत्राभावविकल्पस्य त्रयः प्रकाराः इति ध्वन्यालोकोक्त वचनानुसारेण उचितविकल्पं चिनुत- 1.शब्दार्थगुणालङ्काराणामेव शब्दार्थशोभाकारित्वाल्लोकशास्त्रातिरि
Question

तत्राभावविकल्पस्य त्रयः प्रकाराः इति ध्वन्यालोकोक्त वचनानुसारेण उचितविकल्पं चिनुत-
1.शब्दार्थगुणालङ्काराणामेव शब्दार्थशोभाकारित्वाल्लोकशास्त्रातिरिक्तसुन्दरशब्दार्थमयस्य काव्यस्य शोभाहेतुः
कश्चिदन्योऽस्ति यो अस्माभिर्न गणित इत्येकः प्रकारः।
2. यो वा न गणितः स शोभाकार्येव न भवतीति द्वितीयः ।
3. अथ शोभाकारी भवति तहर्यस्मदुक्त एव गुणे वाऽलंकारे वाऽन्तर्भवति, नामान्तरकरणे तु कियदिदं पांडित्यम्।
4. अथ शोभाकारी भवति तहर्यस्मदुक्त एव गुणे वाऽलंकारे वा नान्तर्भवति, नामान्तरकरणे तु कियदिदं पांडित्यम् ।
एतेषु कानि कथनानि सम्यक् ?

A.

1 & 2 केवलम्

B.

2 & 3 केवलम्

C.

3 & 4 केवलम्

D.

1,2 & 4 केवलम्

Correct option is D


परिचय:
ध्वन्यालोक (आनन्दवर्धन कृत) ग्रन्थ में ध्वनि को काव्य की आत्मा सिद्ध करने के क्रम में, ध्वनि के विरोधी मतों (जो ध्वनि का अभाव मानते हैं) का खण्डन किया गया है। इन विरोधी मतों को ही यहाँ अभावविकल्प कहा गया है।
व्याख्या:
सही उत्तर (d) 1, 2 & 3 केवलम् है, क्योंकि ध्वन्यालोक में 'ध्वनि के अभाव' के समर्थन में यही तीन मुख्य तार्किक विकल्प प्रस्तुत किए गए हैं, जिन्हें बाद में आनन्दवर्धन ने खण्डित किया है।
· कथन 1: शब्दार्थगुणालङ्काराणामेव शब्दार्थशोभाकारित्वाल्लोकशास्त्रातिरिक्तसुन्दरशब्दार्थमयस्य काव्यस्य शोभाहेतुः कश्चिदन्योऽस्ति यो अस्माभिर्न गणित इत्येकः प्रकारः।
· यह कथन सही है।
· प्रथम प्रकार: विरोधी कहते हैं कि काव्य की शोभा के कारण (जैसे गुण, अलंकार) केवल शब्द और अर्थ पर ही आधारित होते हैं। यदि ध्वनि नामक कोई तत्त्व है, तो वह भी इन्हीं गुण/अलंकार आदि से भिन्न होकर भी काव्य की शोभा का कारण है, जिसे हमने (विरोधी आचार्यों ने) अभी तक अपने ग्रन्थों में गिना नहीं है। यह एक प्रकार का अभाव नहीं, बल्कि अगणना (Not Enumerated) का मत है।
· कथन 2: यो वा न गणितः स शोभाकार्येव न भवतीति द्वितीयः।
· यह कथन भी सही है।
· द्वितीय प्रकार: विरोधी कहते हैं कि यदि ध्वनि जैसा कोई तत्त्व है, जो गुण/अलंकार आदि में नहीं गिना गया है, तो वह काव्य की शोभा (उत्कर्ष) का कारण हो ही नहीं सकता। यह अभाव का सीधा मत है, यानी ध्वनि जैसा कोई तत्त्व विद्यमान ही नहीं है।
· कथन 3: अथ शोभाकारी भवति तहर्यस्मदुक्त एव गुणे वाऽलंकारे वाऽन्तर्भवति, नामान्तरकरणे तु कियदिदं पांडित्यम्।
· यह कथन भी सही है।
· तृतीय प्रकार: विरोधी कहते हैं कि यदि ध्वनि काव्य की शोभा का कारण होता है, तो वह हमारे द्वारा बताए गए (पहले से ही स्थापित) गुणों अथवा अलंकारों में ही समाहित (अन्तर्भूत) हो जाता है। केवल नाम बदल देने में ही कौन-सा बड़ा पाण्डित्य है? यह मत ध्वनि को अन्तर्भाव (समाविष्ट) का मत कहता है, अर्थात् ध्वनि की पृथक् सत्ता नहीं है।
रोचक तथ्य:
· कथन 4: अथ शोभाकारी भवति तहर्यस्मदुक्त एव गुणे वाऽलंकारे वा नान्तर्भवति, नामान्तरकरणे तु कियदिदं पांडित्यम्।
· यह कथन गलत है।
· यह कथन 3 का नकारात्मक रूप है। यदि ध्वनि गुण/अलंकार में अन्तर्भूत नहीं होता ('न अन्तर्भवति'), तो इसका अर्थ है कि वह एक पृथक् तत्त्व है। विरोधी आचार्य इस बात को स्वीकार नहीं करते, बल्कि वे उसे अन्तर्भूत (कथन 3) ही मानते हैं।

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