Correct option is A
परिचय: यह प्रश्न
बाणभट्ट कृत
'कादम्बरी' के
शुकनासोपदेश भाग से लिया गया है, जिसमें
लक्ष्मी (धन-सम्पदा) के स्वभाव और दोषों का वर्णन किया गया है।
व्याख्या:
सही उत्तर
(a) केवलं एकं युग्मम् है, क्योंकि इन तीनों कथनों में
केवल कथन 3 ही सही है।
कथन 3 का विश्लेषण (सही) ·
कथन 3:
अभिजातमहिमिव लङ्ङ्घयति लक्ष्मीः।
· यह कथन
सही है।
·
अर्थ: लक्ष्मी
'अभिजातमहत्त्व' (उत्तम कुल या महान् व्यक्ति के गौरव/श्रेष्ठता) को भी अनदेखा कर देती है/लाँघ जाती है।
·
सन्दर्भ: शुकनास बताता है कि लक्ष्मी स्वभाव से ही दोषपूर्ण है। वह महान् और कुलीन व्यक्तियों का भी
तिरस्कार करती है और उनसे दूर रहती है।
कथन 1 का विश्लेषण (असत्य) ·
कथन 1:
गुणवन्तमपवित्रमिव स्पृशति - लक्ष्मीः।
· यह कथन
असत्य है।
·
सही कथन है:
'ईश्वरमिव' (अर्थात् 'अस्पृश्यमिव')। शुकनासोपदेश में कहा गया है:
'गुणवन्तम् अस्पृश्यमिव स्पृशति'।
·
अर्थ: लक्ष्मी
गुणवान व्यक्ति को भी
अस्पृश्य (न छूने योग्य) की तरह मानकर छूती है। (अर्थात् वह गुणों का आदर नहीं करती।)
· प्रश्न में 'अपवित्रम् इव' के स्थान पर
'अस्पृश्यम् इव' पद का प्रयोग है, जो मूल पाठ से भिन्न है, अतः यह युग्म समीचीन नहीं है।
कथन 2 का विश्लेषण (असत्य) ·
कथन 2:
सुजनमनिमित्तमिव पश्यति - लक्ष्मीः।
· यह कथन
असत्य है।
·
सही कथन है:
'अधिगतकुलक्रमम्' (अर्थात् अच्छे कुल के व्यवहार को जानने वाले को)। शुकनासोपदेश में कहा गया है:
'अधिगतकुलक्रमम् अनिमित्तमिव पश्यति'।
·
अर्थ: लक्ष्मी
कुल की परम्पराओं को जानने वाले व्यक्ति को भी
अपशकुन (अनिमित्त) की तरह देखकर उससे दूर भागती है। (अर्थात् वह
सुजन या कुल का सम्मान करने वाले व्यक्ति से भी घृणा करती है।)
· प्रश्न में 'सुजनम्' के स्थान पर
'अधिगतकुलक्रमम्' पद का प्रयोग है, जो मूल पाठ से भिन्न है, अतः यह युग्म समीचीन नहीं है।
अतः, मूल पाठ के अनुसार, केवल कथन 3 ही पूरी तरह से सही है।