Correct option is C


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सूरदास:
"मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायो"
मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायो।मोसों कहत मोल को लीन्हों, जसुमति सों कहि जायो॥कहा करौं इहिं भाँति हमारी, हँसत खात दधि लायो।कबहुँ बोल मुख सों निकसत है, कबहुँ पलक निपटायो॥कबहुँ पाँव खींचि धरि धरनी, कबहुँ मूँदि दै आँखि।कबहुँ कहत आज हम धूरि भरे, कबहुँ कहत हम साखि॥सूरदास प्रभु सुजस सुनत, हँसि यशोदा बोलाय।सुत स्यामल सौं कही मृदु बचन, लाजि गहि उर लाय॥
"उधो मन न भये दस बीस"
उधो मन न भये दस बीस।एक हुतो सो गयो स्याम संग, को अवराधै ईस॥प्रेम बंधन में बँधी गोपियाँ, छूटत नाहिं कलेस।जिनके मन बस्यौ माधव सों, तिनको कहा सनेह॥सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस, बिनु अंधियारी देस॥
"मैया मोहि मैं नहीं माखन खायो"
मैया मोहि मैं नहीं माखन खायो।ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मेरै मुख लपटायो॥देखि तुहूँ मुख दधि लेप भयो, जननि काहे नहिं आयो।जो कछु हौं करि डारि जुगति सों, जानि परै जग दायो॥तू मोहि कसम राम की मैया, देइ ख्याल हँसि आयो।सूरदास जसुमति के सुत को, बंसी हाथ न आयो॥
"जसोदा हरि पालनैं झुलावै"
जसोदा हरि पालनैं झुलावै।हलरावै दुलराइ मल्हावै, जोई सोई कछु गावै॥मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहे न आनि सुलावै।तू काहे नहिं बेगहिं आवै, तोकु कान्ह बुलावै॥कबहुँ पलक हरि मूंदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।माँ जसुमति मुसुकाइ के, मनहि मन बहुत हरषावै॥लै उर कंठ सुत बैठी कबहुँ, ललित लील हरि दिखलावै।सूरदास प्रभु सखा संग, बालचरित सुनावै॥
"अबिगत गति कछु कहत न आवै"
अबिगत गति कछु कहत न आवै।ज्यों गूँगै मीठे फल को रस, स्वाद सुनी मुख पावै॥प्रभु प्रताप रघुनायक बड़वौ, पारब्रह्म सिव गावै।सूरदास तब सरन तिहारी, हरि हरि नाम लखावै॥
तुलसीदास:
"बड़े भाग मानुष तन पावा"
बड़े भाग मानुष तन पावा।सुर दुर्लभ सद्ग्रंथन्हि गावा॥साधन धाम मोक्ष कर द्वारा।पाइ न जेहि परलोक सँवारा॥
"सियाराम मय सब जग जानी"
सियाराम मय सब जग जानी।करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥सिया राममय सब जग जानी।करहुं प्रणाम जोरी जुग पानी॥
"जाकी रही भावना जैसी"
जाकी रही भावना जैसी।प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥
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कबीरदास के पद:
"मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।"
कबीरदास कहते हैं कि ईश्वर को बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है; वह तो हर व्यक्ति के भीतर ही विद्यमान है। यह पद आत्म-साक्षात्कार और आत्म-अन्वेषण की महत्ता को दर्शाता है।
"साधो, देखो जग बौराना।"
इस पद में कबीरदास संसार की मोह-माया और अज्ञानता पर प्रकाश डालते हैं, जो मनुष्य को सत्य से दूर करती है।
"झीनी-झीनी बीनी चदरिया।"
कबीरदास इस पद में शरीर को चादर के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो परमात्मा ने बड़ी नाजुकता से बनाई है। वे कहते हैं कि इस चादर को पवित्र रखना चाहिए, क्योंकि अंत में इसे उसी निर्माता को लौटाना है।
"हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या।"
इस पद में कबीरदास प्रेम की मस्ती में डूबे होने की बात करते हैं, जहाँ दुनियावी चतुराई और होशियारी का कोई स्थान नहीं है।
"कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे बन माहि।"
कबीरदास इस पद में कहते हैं कि जैसे हिरण अपनी नाभि में स्थित कस्तूरी की सुगंध को जंगल में खोजता है, वैसे ही मनुष्य भी ईश्वर को बाहर खोजता है, जबकि वह उसके भीतर ही है।
मीराबाई के पद:
"पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।"
मीरा बाई इस पद में कहती हैं कि उन्होंने राम नाम का अनमोल रत्न प्राप्त किया है, जो सच्चा धन है। यह पद भक्ति की गहराई और ईश्वर के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
"मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई।"
इस पद में मीरा बाई अपने आराध्य कृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति प्रकट करती हैं और कहती हैं कि उनके लिए गिरिधर गोपाल (कृष्ण) के अलावा और कोई नहीं है।
"माई री, मैं तो लियो गोविंद मोल।"
मीरा बाई इस पद में अपनी माँ से कहती हैं कि उन्होंने गोविंद (कृष्ण) को अपने जीवन का आधार बना लिया है और उन्हें अपने जीवन में स्वीकार कर लिया है।
"जो मैं ऐसा जानती, प्रीत करे दुख होय।"
इस पद में मीरा बाई कहती हैं कि यदि उन्हें पता होता कि प्रेम करने से दुख होता है, तो वे किसी से प्रेम न करतीं। यह पद प्रेम की पीड़ा और उसकी गहराई को व्यक्त करता है।
"मीरां के प्रभु गिरिधर नागर।"
मीरा बाई इस पद में अपने प्रभु को गिरिधर नागर (कृष्ण) के रूप में संबोधित करती हैं, जो उनके आराध्य हैं और जिनके प्रति उनकी अनन्य भक्ति है।
