Correct option is D
Ans. (d) :
केशवदास इंद्रजीत सिंह के दरबारी कवि थे तथा इनकी कृति ‘वीरसिंह देव चरित’ है। केशवदास अलंकारवादी कवि हैं।
सही कथन:
वे इंद्रजीत सिंह के दरबारी कवि थे। — केशवदास ओरछा नरेश महाराज रामसिंह के भाई इंद्रजीत सिंह के दरबारी कवि, मंत्री और गुरु थे।
इनकी कृति 'वीरसिंहदेव चरित' है। — 'वीरसिंहदेव चरित' केशवदास की प्रमुख रचनाओं में से एक है, जिसमें उन्होंने महाराज वीरसिंहदेव के चरित्र का वर्णन किया है।
गलत कथन:
इनकी कविता में अलंकारों का प्रयोग बहुत कम हुआ है। — यह कथन गलत है। केशवदास की कविता में अलंकारों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हुआ है। वे अलंकारवादी आचार्य थे और उनकी रचनाओं में अलंकारों की प्रमुखता है।
इन्होंने केवल चौपाई छंद में लिखा है। — यह कथन भी गलत है। केशवदास ने विभिन्न छंदों में रचनाएँ की हैं, जिनमें सवैया, दोहा, कवित्त आदि शामिल हैं। उनकी रचनाओं में छंदों की विविधता देखने को मिलती है .
Information Booster:
केशवदास (1555 ई. – 1617 ई.) हिंदी साहित्य के रीतिकाल के प्रमुख कवि और आचार्य थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश के ओरछा (बुंदेलखंड) राज्य में हुआ था। वे सनाढ्य ब्राह्मण परिवार से थे, उनके पिता का नाम काशीनाथ मिश्र और पितामह का नाम कृष्णदत्त मिश्र था। केशवदास संस्कृत के विद्वान और अलंकारशास्त्री थे, जिन्होंने हिंदी काव्य में संस्कृत की शास्त्रीय परंपरा का समावेश किया।
रचनाएँ:
केशवदास ने लगभग 16 ग्रंथों की रचना की, जिनमें से आठ प्रमुख और प्रामाणिक माने जाते हैं:
रामचंद्रिका (1601 ई.): यह भक्ति संबंधी प्रबंध काव्य है, जिसमें राम और सीता के चरित्र का वर्णन किया गया है। इसमें संस्कृत के अनेक छंदों को हिंदी में ढालने में केशवदास ने अपूर्व सफलता प्राप्त की है।
विज्ञानगीता (1610 ई.): इस ग्रंथ में ज्ञान की महिमा का वर्णन करते हुए जीव को माया से मुक्त होकर ब्रह्म से मिलन का उपाय बताया गया है।
वीरसिंहदेव चरित (1607 ई.): यह ऐतिहासिक प्रबंध काव्य है, जिसमें ओरछा के महाराज वीरसिंहदेव के चरित्र का वर्णन किया गया है।
जहाँगीर जसचंद्रिका (1612 ई.): इस ग्रंथ में मुगल सम्राट जहाँगीर के गुणों और कार्यों का वर्णन किया गया है।
रतन बावनी (1607 ई.): यह ग्रंथ रत्नों के गुणों और विशेषताओं का वर्णन करता है।
रसिकप्रिया (1591 ई.): यह काव्यशास्त्र संबंधी ग्रंथ है, जिसमें रसों का विवेचन और नायिका भेद का वर्णन किया गया है।
कविप्रिया (1601 ई.): इस ग्रंथ में कवि के कर्तव्यों और अलंकारों का वर्णन किया गया है।
नखशिख: इसमें नख से शिखा तक नायिका के अंगों का वर्णन किया गया है।
भाषा और शैली:
केशवदास ने ब्रजभाषा को अपनी काव्य भाषा के रूप में अपनाया, जिसमें बुंदेलखंडी का मिश्रण भी देखा जाता है। उनकी कविता में अलंकारों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हुआ है, जिससे उनकी रचनाएँ अलंकारिक सौंदर्य से परिपूर्ण हैं। उन्होंने वीर रस, शृंगार रस, और नीति विषयक काव्य की रचना की, जिसमें राजसी वैभव का उत्कृष्ट वर्णन मिलता है।
साहित्य में स्थान:
केशवदास हिंदी साहित्य में आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने संस्कृत की शास्त्रीय परंपरा को हिंदी में स्थापित किया और रीति साहित्य की नींव रखी। उनकी रचनाएँ हिंदी काव्यशास्त्र के अध्ययन में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। सूरदास और तुलसीदास के बाद हिंदी कवियों में केशवदास को तीसरा स्थान दिया गया है:
"सूर-सूर तुलसी ससी, उडुगन केशवदास।"
- "भिखारीदास"