Correct option is C
भारतेन्दु युग (1868-1900) के प्रमुख निबंधकारों में काशीनाथ खत्री और राधाचरण गोस्वामी का महत्वपूर्ण स्थान है। इस युग के अन्य प्रमुख निबंधकारों में बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन', प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बालमुकुंद गुप्त, और भारतेंदु हरिश्चंद्र शामिल हैं।
पद्मसिंह शर्मा हिंदी के प्रथम संस्मरणकार माने जाते हैं, और उनकी प्रमुख रचना 'पद्मपराग' 1929 ई. में प्रकाशित हुई थी।
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भारतेन्दु युग (1868-1900) हिंदी साहित्य के विकास में एक महत्वपूर्ण कालखंड है, जिसमें निबंध विधा ने विशेष प्रगति की। इस युग के प्रमुख निबंधकारों और उनकी रचनाओं का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है:
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1850-1885):भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को हिंदी साहित्य के भारतेन्दु युग का प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने निबंध, कविता, नाटक, और पत्रकारिता के माध्यम से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उनके प्रमुख निबंधों में "उदयपुरोदय", "काश्मीर कुसुम", "बादशाह दर्पण", "कालचक्र", "लेवी प्राण लेवी", "ज्ञाति विवेकिनी सभा", "स्वर्ग में विचार सभा अधिवेशन", "अंग्रेज स्रोत", "पांचवें पैगंबर", और "कंकड़ स्रोत" शामिल हैं। इन निबंधों में उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, और सांस्कृतिक विषयों पर विचार व्यक्त किए हैं।
बालकृष्ण भट्ट (1844-1914):बालकृष्ण भट्ट "हिंदी प्रदीप" पत्रिका के संपादक थे। उन्होंने विवरणात्मक, वर्णनात्मक, विचारात्मक, और भावात्मक निबंध लिखे। उनके प्रमुख निबंधों में "मेला-ठेला", "वकील", "सहानुभूति", "आशा", "खटका", "रोटी तो किसी भांति कमाय खाय", "मुछंदर इंगलिश पढ़े तो बाबू होय", "आत्मनिर्भरता", "शब्द की आकर्षण शक्ति", और "माधुर्य" शामिल हैं। इन निबंधों में उन्होंने समाज की विभिन्न समस्याओं और मानवीय भावनाओं का विश्लेषण किया है।
प्रतापनारायण मिश्र (1856-1894):प्रतापनारायण मिश्र "ब्राह्मण" पत्रिका के संपादक थे। उन्होंने विविध विषयों पर निबंध लिखे, जिनमें शारीरिक अंगों जैसे "भौं", "दांत", "पेट", "मूंछ", "नाक" आदि पर रोचक निबंध शामिल हैं। अन्य निबंधों में "प्रताप चरित", "वृद्ध", "दान", "जुआ", "अपव्यय", "ईश्वर की मूर्ति", "नास्तिक", "शिवमूर्ति", "सोने का डंडा", और "मनोवेग" प्रमुख हैं। उनकी भाषा में मुहावरों का प्रचुर प्रयोग मिलता है, जो उनके निबंधों को जीवंत बनाता है।
बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' (1856-1927):बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' ने "आनंद कादंबिनी" (मासिक) और "नागरी नीदर" (साप्ताहिक) पत्रिकाओं का संपादन किया। उनके निबंधों में "हिंदी भाषा का विकास", "परिपूर्ण प्रवास", और "उत्साह आलंबन" प्रमुख हैं। उनकी भाषा आलंकारिक, कृत्रिम, और चमत्कारी है, जिसमें चमत्कार उत्पन्न करने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है।
बालमुकुंद गुप्त (1865-1907):बालमुकुंद गुप्त ने "बंगवासी" और "भारत मित्र" पत्रिकाओं का संपादन किया। उन्होंने "शिवशंभू के चिट्ठे" के नाम से निबंध लिखे, जिनमें "शिवशंभू का चिट्ठा" विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इन निबंधों में उन्होंने ब्रिटिश शासन की नीतियों और अत्याचारों पर मीठा, चुभता हुआ व्यंग्य किया है। उनकी भाषा सरल, स्पष्ट, और व्यंग्यपूर्ण है, जो पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है।
राधाचरण गोस्वामी (1859-1923):राधाचरण गोस्वामी के निबंध व्यंग्य से ओत-प्रोत हैं। उन्होंने समकालीन समाज की कुरीतियों और बुराइयों पर तीखा व्यंग्य किया है। उनका निबंध "यमपुर की यात्रा" विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसमें उन्होंने धार्मिक अंधविश्वासों पर करारा प्रहार किया है। उनकी भाषा में हास्य और व्यंग्य का मिश्रण मिलता है, जो पाठकों को आनंदित करता है।
