Correct option is C
ans. (c)
विष्णुकांत शास्त्री के संस्मरण 'सुधियाँ उस चंदन के वन की' का शीर्षक प्रसिद्ध कवि गिरिजाकुमार माथुर की कविता 'मंजीर' से प्रेरित है
'सुधियाँ उस चंदन के वन की' विष्णुकांत शास्त्री द्वारा रचित एक प्रमुख संस्मरण संग्रह है, जो 1992 में प्रकाशित हुआ।
इस संग्रह में कुल 12 आलेख शामिल हैं, जिनमें स्वामी अखंडानंद सरस्वती, महादेवी वर्मा, अज्ञेय, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, उमा शंकर जोशी आदि प्रमुख साहित्यकारों और व्यक्तित्वों के साथ लेखक के अनुभवों का वर्णन है।
संस्मरणों में लेखक ने अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं, साहित्यिक जगत के महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों, और विदेश यात्राओं से जुड़े अनुभवों को साझा किया है। इन संस्मरणों के माध्यम से पाठक उन व्यक्तित्वों के गंभीर और विनोदी पक्षों को जान पाते हैं, जैसे अज्ञेय की आस्तिकता की ओर झुकाव की घटना, महादेवी वर्मा का सबसे बड़ा रोष, और नामवर सिंह की दिल्ली आने पर खाई गई तीन कसमें।
इसके अतिरिक्त, लेखक ने गुजरात, सूरीनाम, और गुयाना जैसे देशों की यात्राओं के अनुभवों को भी साझा किया है, जिससे पाठक उन स्थानों की सांस्कृतिक और सामाजिक स्थितियों से परिचित होते हैं।
Information Booster:
विष्णुकांत शास्त्री (2 मई 1929 – 17 अप्रैल 2005) एक प्रख्यात भारतीय राजनीतिज्ञ, साहित्यकार, और शिक्षाविद् थे, जिन्होंने हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के रूप में सेवा की। उनका जन्म कोलकाता में पंडित गांगेय नरोत्तम शास्त्री और रूपेश्वरी देवी के घर हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में, उन्होंने कोलकाता के सारस्वत विद्यालय, प्रेसीडेंसी कॉलेज, और फिर कोलकाता विश्वविद्यालय से अध्ययन किया, जहाँ उन्होंने हिंदी में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त किया। 26 जनवरी 1953 को उनका विवाह इंदिरा देवी से हुआ, जिनसे उनकी एक पुत्री भारती शर्मा हैं।
राजनीतिक जीवन में, वे 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर पश्चिम बंगाल विधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। 1982 से 1986 तक पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष और 1988 से 1993 तक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे। 1992 से 1998 तक वे राज्यसभा सांसद रहे। 2 दिसंबर 1999 से 23 नवंबर 2000 तक हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल और 24 नवंबर 2000 से 2 जुलाई 2004 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के पद पर रहे।
साहित्यिक क्षेत्र में, शास्त्री जी भक्ति साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान थे। उनकी प्रमुख कृतियों में 'कवि निराला की वेदना तथा निबंध', 'कुछ चंदन की कुछ कपूर की', 'चिंतन मुद्रा', 'अनुचिंतन', 'तुलसी के हियहेरि', 'बांग्लादेश के संदर्भ में', 'स्मरण को पाथेय बनने दो', 'सुधियाँ उस चंदन के वन की', 'भक्ति और शरणागत', 'ज्ञान और कर्म', और 'अनंत पथ के यात्री' शामिल हैं। उन्होंने बांग्ला से हिंदी में 'उपकालिदासय' और 'संकल्प-संत्रास-संकल्प' का अनुवाद भी किया।
शास्त्री जी ने विभिन्न देशों जैसे सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, बांग्लादेश, कनाडा, रूस, सिंगापुर, मलेशिया, और थाईलैंड का भ्रमण किया। उन्हें आचार्य रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार, राज्य साहित्यिक पुरस्कार, और साहित्य भूषण सम्मान सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 17 अप्रैल 2005 को पटना में गीता पर व्याख्यान देने जाते समय रेल यात्रा के दौरान हृदयाघात से उनका निधन हो गया।
Additional Knowledge :
गिरिजाकुमार माथुर (22 अगस्त 1919 – 10 जनवरी 1994) हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, नाटककार, और समालोचक थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश के अशोकनगर में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा झांसी में प्राप्त करने के बाद, उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. और एल.एल.बी. की डिग्री हासिल की। कुछ समय तक वकालत करने के बाद, वे 1943 में ऑल इंडिया रेडियो से जुड़े और विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। लोकप्रिय रेडियो चैनल 'विविध भारती' की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। दूरदर्शन में उप-महानिदेशक के पद से वे सेवानिवृत्त हुए।
माथुर जी की साहित्यिक यात्रा 1941 में प्रकाशित प्रथम काव्य संग्रह 'मंजीर' से आरंभ हुई, जिसकी भूमिका सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने लिखी थी। 1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित 'तार सप्तक' में उनकी कविताएँ शामिल की गईं, जो हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। उनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं: 'नाश और निर्माण', 'धूप के धान', 'शिलापंख चमकीले', 'जो बंध नहीं सका', 'भीतरी नदी की यात्रा', 'साक्षी रहे वर्तमान', 'कल्पांतर', 'मैं वक्त के हूँ सामने', 'मुझे और अभी कहना है', 'पृथ्वीकल्प', और 'छाया मत छूना मन'। उनका प्रसिद्ध गीत 'छाया मत छूना मन' और 'हम होंगे कामयाब' (अंग्रेजी गीत 'We Shall Overcome' का हिंदी अनुवाद) अत्यंत लोकप्रिय हुए।
गिरिजाकुमार माथुर को 1991 में उनके काव्य संग्रह 'मैं वक्त के हूँ सामने' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1993 में इसी कृति के लिए उन्हें व्यास सम्मान भी प्राप्त हुआ। उनकी साहित्यिक यात्रा में छायावादी संस्कारों के साथ-साथ प्रगतिशील चेतना का समावेश था, जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना:
कविता संग्रह:
- काठ की घंटियाँ
- बाँस का पुल
- एक सूनी नाव
- खूँटियों पर टंगे लोग
कहानी संग्रह:
- पागल कुत्तों का मसीहा
- सपनों का मुल्क
नाटक:
- बकरी
- लाख की नाक
बाल साहित्य:
- बतूता का जूता
- महंगू की टाई
रघुवीर सहाय:
कविता संग्रह:
- सीढ़ियों पर धूप में
- आत्महत्या के विरुद्ध
- हँसो, हँसो, जल्दी हँसो
- लोग भूल गए हैं
कहानी संग्रह:
- रास्ता इधर से है
- जो आदमी हम बना रहे हैं
निबंध संग्रह:
- दिल्ली मेरा परदेस
- लिखने का कारण
कीर्ति चौधरी:
कविता संग्रह:
प्यार करो
क्रमशःवे कैसे दिन थे
आगत का स्वागत
खँडहर का पौधा
एक सुनहली किरण उसे भी दे दो
अनुपस्थिति
दो ज़िंदगियाँ
जड़ता
दंड दो मुझे
यथास्थान
