Correct option is C
सही उत्तर: (c) रामविलास शर्मा
यह कथन रामविलास शर्मा का है, जो भारतेन्दु युग के साहित्य और निबंध लेखन की विशिष्टता को स्पष्ट करता है। भारतेन्दु युग के लेखकों ने निबंध लेखन में जो गहराई और प्रामाणिकता प्रस्तुत की, वह कविता और नाटक में उतनी प्रभावशाली नहीं थी।
Information Booster:
रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि:
डॉ. रामविलास शर्मा हिंदी साहित्य के प्रमुख आलोचक, विचारक और साहित्यकार थे। उनकी आलोचना दृष्टि बहुआयामी और गहन थी। उन्होंने भारतीय साहित्य, संस्कृति, भाषा, इतिहास और समाज को अपने आलोचनात्मक चिंतन का आधार बनाया। उनकी आलोचना दृष्टि के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. मार्क्सवादी दृष्टिकोण:
- रामविलास शर्मा हिंदी साहित्य में मार्क्सवादी आलोचना के प्रमुख स्तंभों में से एक थे।
- उन्होंने साहित्य और समाज के आपसी संबंधों का विश्लेषण किया और बताया कि साहित्य सामाजिक परिवर्तन का माध्यम कैसे बन सकता है।
- उनके अनुसार, साहित्य समाज की परिस्थितियों और संघर्षों का प्रतिबिंब है।
- प्रेमचंद और उनका युग (1952) में उन्होंने प्रेमचंद की रचनाओं को सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से विश्लेषित किया।
2. साहित्य और इतिहास का समन्वय:
- उनकी आलोचना दृष्टि में इतिहास और साहित्य का गहन संबंध दिखाई देता है।
- उन्होंने साहित्य को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा और इस बात पर जोर दिया कि किसी भी साहित्यिक रचना को उसके समय, स्थान और सामाजिक परिवेश के संदर्भ में समझना आवश्यक है।
- उनके ग्रंथ भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परंपरा (1975) में यह दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
3. भारतीयता और सांस्कृतिक चेतना:
- रामविलास शर्मा ने अपनी आलोचना में भारतीय संस्कृति और परंपराओं को विशेष महत्व दिया।
- उन्होंने भारतीय साहित्य को पश्चिमी प्रभाव से मुक्त करने और उसकी मौलिकता को बनाए रखने की वकालत की।
- उनका मानना था कि भारतीय साहित्य को अपनी जड़ों और मूल्यों से जोड़कर ही समझा और प्रस्तुत किया जा सकता है।
4. भाषा विज्ञान और साहित्य:
- रामविलास शर्मा हिंदी भाषा और उसके विकास के गहन अध्येता थे।
- उन्होंने भाषा, युगबोध और कविता (1981) में हिंदी भाषा के साहित्यिक प्रयोग और उसकी सामाजिक भूमिका पर विचार किया।
- उनकी रचनाओं में हिंदी भाषा के विकास और उसके समाजशास्त्रीय पहलुओं का विश्लेषण मिलता है।
5. साहित्य में मानवतावादी दृष्टि:
- उनकी आलोचना दृष्टि में मानवतावादी मूल्य प्रमुख हैं।
- उन्होंने साहित्य को मानव समाज की समस्याओं, संघर्षों और आशाओं का दर्पण माना।
- साहित्य को व्यक्ति और समाज के कल्याण का माध्यम माना।
6. प्रगतिशील और जनवादी दृष्टिकोण:
- रामविलास शर्मा ने साहित्य को प्रगतिशील दृष्टिकोण से देखा और इसे सामाजिक न्याय और समानता के आदर्शों का वाहक माना।
- उन्होंने प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ (1954) में प्रगतिशील आंदोलन की विचारधारा और साहित्य में उसकी भूमिका पर चर्चा की।
मुख्य रचनाएँ:
- प्रेमचंद और उनका युग (1952)
- निराला की साहित्य साधना (1969-76)
- भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परंपरा (1975)
- महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण (1977)
- भाषा, युगबोध और कविता (1981)
- भारतीय साहित्य के इतिहास की समस्याएँ (1986)
