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    . रामचंद्र शुक्ल के अनुसार इंशाअल्ला खाँ ने अपनी भाषा को किस प्रकार के शब्दों से मुक्त रखने की प्रतिज्ञा नहीं की थी?
    Question

    . रामचंद्र शुक्ल के अनुसार इंशाअल्ला खाँ ने अपनी भाषा को किस प्रकार के शब्दों से मुक्त रखने की प्रतिज्ञा नहीं की थी?

    A.

    बाहर की बोली

    B.

    गँवारी

    C.

    भाखापन

    D.

    तत्सम

    Correct option is D

    Ans. (d)

    रामचंद्र शुक्ल के अनुसार इंशाअल्ला खाँ ने अपनी भाषा को तत्सम के शब्दों से मुक्त रखने की प्रतिज्ञा नहीं की थी। इंशा अल्ला खाँ ने अपनी भाषा को तीन प्रकार के शब्दों से मुक्त रखने की प्रतिज्ञा की थी- बाहर की बोली अरबी, फारसी, तुरकी। गँवारी = ब्रजभाषा, अवधी आदि, भाखापन = संस्कृत के शब्दों का मेल।

    Information Booster:
    इंशाअल्ला खाँ की रचनाएं
    इंशा अल्ला खाँ 'इंशा' (1756 – 1817) उर्दू और हिंदी साहित्य के प्रमुख साहित्यकारों में से एक थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं:

    1. दरया-ए-लताफत:यह उर्दू भाषा का प्रथम व्याकरण ग्रंथ माना जाता है, जिसमें उर्दू भाषा की संरचना, व्याकरणिक नियम और शब्दावली का विशद वर्णन किया गया है।

    2. रानी केतकी की कहानी:यह हिंदी खड़ी बोली में लिखी गई एक महत्वपूर्ण कहानी है, जिसे हिंदी की पहली कहानी भी माना जाता है। यह रचना उर्दू लिपि में लिखी गई थी और इसमें अरबी, फारसी, तुर्की, ब्रजभाषा, अवधी और संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है, जिससे भाषा सरल और सुबोध बनी है।

    3. दीवान-ए-इंशा:यह उनका उर्दू ग़ज़लों का संग्रह है, जिसमें उनकी शायरी की विविधता और गहराई प्रकट होती है।

    4. मसनवी शिकारनामा:यह एक लंबी कविता है, जिसमें शिकार के अनुभवों का वर्णन किया गया है।

    5. दीवान-ए-रेख्ती:इस संग्रह में रेख्ती शैली की कविताएँ शामिल हैं, जो महिलाओं की भाषा और भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं

    Additional Knowledge:

    इंशा अल्ला खाँ 'इंशा'(1756 – 1817) हिंदी और उर्दू साहित्य के प्रमुख साहित्यकारों में से एक थे। उनका जन्म मुर्शिदाबाद में हुआ था। वे लखनऊ और दिल्ली के दरबारों में कवि के रूप में प्रतिष्ठित थे। इंशा बहुभाषाविद् थे और उन्होंने 'दरया-ए-लताफत' नामक उर्दू का पहला व्याकरण ग्रंथ लिखा।

    हिंदी साहित्य में उनका महत्वपूर्ण योगदान 'रानी केतकी की कहानी' है, जिसे हिंदी की पहली कहानी माना जाता है। यह रचना उर्दू लिपि में लिखी गई थी, लेकिन इसकी भाषा खड़ी बोली हिंदी थी। इंशा ने अपनी भाषा को अरबी, फारसी, तुर्की, ब्रजभाषा, अवधी और संस्कृत के तत्सम शब्दों से मुक्त रखने का प्रयास किया, जिससे उनकी भाषा सरल और सुबोध बनी।

    इंशा अल्ला खाँ का जीवन उतार-चढ़ाव से भरा था। शाह आलम द्वितीय के दरबार में उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण लखनऊ चले गए। वहाँ नवाब सआदत अली खाँ के दरबार में उन्होंने सेवा की, लेकिन बाद में दरबार से अलग होना पड़ा। 1817 में उनका निधन हो गया।

    इंशा अल्ला खाँ की रचनाएँ उनकी बहुमुखी प्रतिभा और भाषा पर अद्वितीय पकड़ को दर्शाती हैं, जो हिंदी और उर्दू साहित्य में उन्हें एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती हैं।

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