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. रामचंद्र शुक्ल के अनुसार 'शिवसिंह सरोज' में गिनाए गए ग्रंथ हैं-रामसतसईकड़खा रामायणदोहावलीकवित्त रामायणनीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
Question

. रामचंद्र शुक्ल के अनुसार 'शिवसिंह सरोज' में गिनाए गए ग्रंथ हैं-

  1. रामसतसई
  2. कड़खा रामायण
  3. दोहावली
  4. कवित्त रामायण

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

A.

1 और 2

B.

 2 और 3

C.

 3 और 4

D.

2 और 4

Correct option is A

 Ans. (a)

स्पष्टीकरण:
रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, 'शिवसिंह सरोज' में जिन ग्रंथों का उल्लेख है, वे 'रामसतसई' और 'कड़खा रामायण' हैं। 'दोहावली' और 'कवित्त रामायण' का उल्लेख इसमें नहीं किया गया है। यह विश्लेषण शिवसिंह सरोज और रामचंद्र शुक्ल के साहित्यिक दृष्टिकोण पर आधारित है।

Information Booster:

'शिवसिंह सरोज' हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसे 1878 ई. में शिवसिंह सेंगर ने रचा था। यह ग्रंथ हिंदी साहित्य के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है, क्योंकि इसमें लगभग एक हजार कवियों के जीवन परिचय और उनकी रचनाओं का संकलन है।

लेखक परिचय:शिवसिंह सेंगर का जन्म 1833 ई. में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के कांथा गांव में हुआ था। वे पेशे से पुलिस इंस्पेक्टर थे, लेकिन संस्कृत, फ़ारसी और हिंदी साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। उन्होंने 'ब्रह्मोत्तर खंड' और 'शिव पुराण' का हिंदी में अनुवाद भी किया।

ग्रंथ की विशेषताएं:'शिवसिंह सरोज' में 15वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक के लगभग 1003 हिंदी कवियों का संक्षिप्त आलोचनात्मक विवरण और उनकी कुछ रचनाएं सम्मिलित हैं। यह ग्रंथ परवर्ती हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। डॉ. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने अपनी अंग्रेज़ी पुस्तक 'द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान', मिश्र बंधुओं ने 'मिश्र बंधु विनोद' और आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' लिखने में 'शिवसिंह सरोज' की सहायता ली थी।

प्रकाशन इतिहास:इस ग्रंथ का पहला संस्करण 1878 ई. में मुंशी नवल किशोर प्रेस से प्रकाशित हुआ। 1883 ई. में इसका तीसरा संस्करण और 1926 ई. में सातवां संस्करण प्रकाशित हुआ। इसकी लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 1970 में हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से इसका नवीनतम संस्करण प्रकाशित हुआ।

इसमे काल विभाजन एवं नामकरण का प्रयास नहीं किया गया है । 

महत्व:'शिवसिंह सरोज' हिंदी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है, जिसने परवर्ती साहित्येतिहासकारों को सामग्री और दिशा प्रदान की। यह ग्रंथ हिंदी साहित्य के विकास, कवियों के जीवन और उनकी रचनाओं की समझ के लिए आज भी संदर्भ ग्रंथ के रूप में मान्य है।

इसे हिन्दी साहित्य के इतिहास का प्रस्थान बिन्दु कहा जाता है । 

Additional Booster:

(A) रामसतसई:
'राम सतसई' हिंदी साहित्य की सतसई परंपरा में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस ग्रंथ के रचयिता रामसहाय दास हैं, जो काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह के दरबारी कवि थे। उन्होंने 'राम सतसई' की रचना बिहारीलाल की प्रसिद्ध 'बिहारी सतसई' के अनुकरण पर की थी। इस ग्रंथ में 700 से अधिक शृंगारपरक दोहे संकलित हैं, जिनमें संयोग और वियोग दोनों पक्षों का सुंदर वर्णन मिलता है।​

(B) कड़खा रामायण:
यह रामकथा का एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करने वाला ग्रंथ है, जो लोकभाषा में लिखा गया है। इसका साहित्यिक महत्व 'शिवसिंह सरोज' में उल्लेख से प्रमाणित होता है।

(C) दोहावली:
यह तुलसीदास की प्रसिद्ध रचना है, जिसमें नैतिक और धार्मिक शिक्षा के दोहे संकलित हैं। हालाँकि, इसका उल्लेख 'शिवसिंह सरोज' में नहीं किया गया है।

(D) कवित्त रामायण:
यह एक काव्य रचना है, जो रामकथा को कवित्त शैली में प्रस्तुत करती है। यह भी 'शिवसिंह सरोज' के अंतर्गत नहीं आता।

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