Correct option is D
ans. (d) 1 और 3
अध्यापक पूर्णसिंह (17 फ़रवरी 1881 – 31 मार्च 1931) हिंदी साहित्य के द्विवेदी युग के प्रमुख निबंधकारों में से एक थे। उन्होंने हिंदी में कुल छह निबंध लिखे, जो 'सरस्वती' पत्रिका में प्रकाशित हुए थे। इन निबंधों के शीर्षक हैं:
- सच्ची वीरता
- कन्यादान
- पवित्रता
- आचरण की सभ्यता
- मजदूरी और प्रेम
- अमरीका का मस्त जोगी वाल्ट ह्विटमैन
इन निबंधों में से 'सच्ची वीरता' और 'कन्यादान' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 'सच्ची वीरता' में उन्होंने वास्तविक साहस और वीरता के गुणों पर प्रकाश डाला है, जबकि 'कन्यादान' में समाज में कन्यादान की परंपरा और उसके महत्व पर विचार किया है।
अन्य निबंधों में 'पवित्रता', 'आचरण की सभ्यता', 'मजदूरी और प्रेम', और 'अमरीका का मस्त जोगी वाल्ट ह्विटमैन' शामिल हैं, जो उनके विचारों और समाज सुधार की दृष्टि को प्रकट करते हैं।
नोट: 'परीक्षा' निबंध प्रताप नारायण मिश्र द्वारा लिखा गया है, न कि अध्यापक पूर्णसिंह द्वारा।
Information Booster :
अध्यापक पूर्ण सिंह (17 फ़रवरी 1881 – 31 मार्च 1931) हिंदी साहित्य के द्विवेदी युग के प्रमुख निबंधकारों में से एक थे। उनका जन्म एबटाबाद (अब पाकिस्तान में) के एक संपन्न और प्रभावशाली परिवार में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा रावलपिंडी में प्राप्त करने के बाद, उन्होंने लाहौर से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात, वे रसायन शास्त्र के अध्ययन के लिए जापान गए और वहाँ 'एंपिरियल यूनिवर्सिटी' में तीन वर्ष तक अध्ययन किया। जापान में ही उनकी भेंट स्वामी रामतीर्थ से हुई, जिनसे प्रभावित होकर उन्होंने संन्यास धारण किया। बाद में, उन्होंने गृहस्थ जीवन अपनाया और देहरादून के 'फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट' में अध्यापक के पद पर कार्य किया, जिससे उनके नाम के साथ 'अध्यापक' शब्द जुड़ गया।
Additional Knowledge:
प्रताप नारायण मिश्र (24 सितंबर 1856 – 6 जुलाई 1894) हिंदी साहित्य के भारतेंदु युग के प्रमुख निबंधकार, कवि, नाटककार और संपादक थे। उन्होंने हिंदी गद्य को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके निबंधों में समाज सुधार, संस्कृति, धर्म, राजनीति और दैनिक जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार किया गया है।
प्रमुख निबंध:
शिवमूर्ति: इस निबंध में मिश्र जी ने शिव की मूर्तियों के विभिन्न रूपों और उनके प्रतीकात्मक अर्थों पर विचार किया है। उन्होंने मूर्तियों के निर्माण में प्रयुक्त विभिन्न पदार्थों—जैसे पाषाण, धातु, रत्न, मृत्तिका, गोबर, पारा आदि—के माध्यम से ईश्वर के विभिन्न गुणों और भक्तों के साथ उनके संबंधों को समझाया है। उदाहरण के लिए, पाषाण की मूर्ति दृढ़ता का प्रतीक है, जबकि धातु की मूर्ति दयालुता को दर्शाती है।
धोखा: इस निबंध में उन्होंने समाज में प्रचलित धोखे की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है। मिश्र जी ने बताया है कि कैसे लोग अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को धोखा देते हैं और यह प्रवृत्ति समाज के नैतिक पतन का कारण बनती है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया है कि हमें धोखे से बचने के लिए सतर्क रहना चाहिए और सच्चाई का पालन करना चाहिए।
परीक्षा: इस निबंध में मिश्र जी ने शिक्षा प्रणाली में परीक्षाओं की भूमिका और उनके प्रभाव पर चर्चा की है। उन्होंने बताया है कि कैसे परीक्षाएँ छात्रों पर मानसिक दबाव डालती हैं और वास्तविक ज्ञान के आकलन में असफल रहती हैं। उन्होंने सुझाव दिया है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना नहीं होना चाहिए, बल्कि वास्तविक ज्ञान और चरित्र निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
आप: इस निबंध में उन्होंने 'आप' शब्द के विभिन्न प्रयोगों और उनके सामाजिक संदर्भों पर विचार किया है। मिश्र जी ने बताया है कि कैसे 'आप' शब्द का प्रयोग सम्मान, विनम्रता और सामाजिक संबंधों में किया जाता है। उन्होंने यह भी बताया है कि भाषा में शब्दों का सही प्रयोग सामाजिक सौहार्द्र और समझ को बढ़ाता है।
बात: इस निबंध में मिश्र जी ने 'बात' शब्द के विभिन्न अर्थों और उसके प्रभावों पर चर्चा की है। उन्होंने बताया है कि कैसे एक छोटी सी 'बात' बड़े विवाद का कारण बन सकती है, और कैसे शब्दों का सावधानीपूर्वक चयन और प्रयोग समाज में शांति और समझ को बढ़ावा देता है।
