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    ​अधोलिखितग्रन्थाः कालक्रमानुसारं स्थापनीयाः -A. प्रौढमनोरमाB. लघुमञ्जूषाC. वाक्यपदीयम्D. सिद्धहेमशब्दानुशासनम्अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-
    Question

    अधोलिखितग्रन्थाः कालक्रमानुसारं स्थापनीयाः -

    A. प्रौढमनोरमा

    B. लघुमञ्जूषा

    C. वाक्यपदीयम्

    D. सिद्धहेमशब्दानुशासनम्

    अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-


    A.

     A, B, C, D


    B.

     C, D, B, A


    C.

     C, D, A, B


    D.

     D, B, C, A

    Correct option is C

    C.वाक्यपदीयम्

    • वाक्यपदीयम् संस्कृत व्याकरण और भाषा दर्शन का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी रचना भर्तृहरि ने की थी।

    • वाक्यपदीयम् की रचना का काल लगभग 5वीं शताब्दी ईस्वी माना जाता है, जो इसे दिए गए विकल्पों में सबसे प्राचीन ग्रंथ बनाता है। यह भाषा के दार्शनिक पहलुओं, शब्द और अर्थ के संबंध, तथा वाक्य की प्रकृति पर गहन विचार प्रस्तुत करता है।

    D. सिद्धहेमशब्दानुशासनम्

    • सिद्धहेगखब्दानुशासनम् एक व्याकरण ग्रंथ है जिसे आचार्य हेमचंद्र ने लिखा था।
    • हेमचंद्र का काल 12वीं शताब्दी ईस्वी है, इसलिए सिद्धहेमशब्दानुशासनम् वाक्यपदीयम् के बाद आता है। यह ग्रंथ संस्कृत के साथ-साथ प्राकृत भाषाओं के व्याकरण पर भी केंद्रित है।

    • यह ग्रंथ गुजरात के चालुक्य राजा सिद्धराज जयसिंह के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने हेमचंद्र को इसका लेखन करने के लिए प्रेरित किया था।


      A. प्रौढमनोरमा

    • प्रौढमनोरमा भट्टोजि दीक्षित द्वारा रचित सिद्धांतकौमुदी पर एक टीका (व्याख्या) ग्रंथ है।

    • भट्टोजि दीक्षित का काल 16 वीं-17वीं शताब्दी ईस्वी है, जो इसे सिद्धहेमशब्दानुशासनम् के बाद का बनाता है। यह पाणिनीय व्याकरण की जटिलताओं को स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    • प्रौढमनोरमा पर बाद में जगन्नाथ पंडितराज ने "मनोरमाकुचमर्दिनी" नामक टीका लिखी, जो व्याकरणिक विवादों का एक प्रसिद्ध उदाहरण है।


    B. लघुमन्जूषा

    • लघुमन्जूषा नागेश भट्ट द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण व्याकरणिक ग्रंथ है, जो शब्दशक्ति पर केंद्रित है।

    • नागेश भट्ट का काल 18वीं शताब्दी ईस्वी है, जो उन्हें दिए गए लेखकों में सबसे नवीन बनाता है।

    •  लघुमंजूषा शब्दशक्ति, व्यंजना, और अन्य भाषा दार्शनिक अवधारणाओं का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करती है।

    • नागेश भट्ट ने व्याकरण, दर्शन और धर्मशास्त्र पर अनेक ग्रंथ लिखे हैं, और उन्हें पाणिनीय परंपरा के अंतिम महान वैयाकरणों में से एक माना जाता है।


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