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अधस्तनयुग्मानां समीचीनां तालिकां चिनुत-List-I List-IIa. यास्कः i. विश्वसृष्टेः इतिहासः ।b. सायणः ii. पुरा नवं भवति।C. वायुपुराणम्  iii. जगतः प्रा
Question

अधस्तनयुग्मानां समीचीनां तालिकां चिनुत-

List-I

List-II

a. यास्कः

i. विश्वसृष्टेः इतिहासः ।

b. सायणः

ii. पुरा नवं भवति।

C. वायुपुराणम् 

iii. जगतः प्रागवस्थामनुक्रम्य सर्ग-प्रतिपादकं वाक्यजातं पुराणम्।

d. मधुसूदन सरस्वती

iv. यस्मात् पुरा हि अनति।

समुचितं विकल्पं चिनुत-

A.

a-ii, b-iv, c-i, d-iii

B.

a-i, b-ii, c-iii, d-iv

C.

 a-iv, b-i, c-ii, d-iii

D.

a-ii, b-iii, c-iv, d-i

Correct option is D

 परिचय:

 'पुराण' शब्द की व्युत्पत्ति और परिभाषा की खोज भारतीय ज्ञान परंपरा के प्राचीनतम ग्रंथों (निरुक्त) से लेकर मध्यकालीन दार्शनिकों तक में की गई है।

व्याख्या

a. यास्कः (ii) पुरा नवं भवति।

  • यास्क ने अपने ग्रंथ निरुक्त (सबसे प्राचीन उपलब्ध भाषाशास्त्रीय ग्रंथ) में 'पुराण' शब्द की व्युत्पत्ति दी है।

  • पुरा नवं भवति: अर्थात् जो 'पुरा' (प्राचीन काल में) होकर भी 'नवम्' (नया/नवीन) बना रहता है। इसका तात्पर्य है कि पुराण वे प्राचीन कथाएँ हैं, जो युगों-युगों तक नवीन और प्रासंगिक बनी रहती हैं।

b. सायणः (iii) जगतः प्रागवस्थामनुक्रम्य सर्ग-प्रतिपादकं वाक्यजातं पुराणम्।

  • सायणाचार्य (वैदिक ग्रंथों के प्रसिद्ध भाष्यकार) ने अपनी टीकाओं में पुराण का लक्षण दिया है।

  • जगतः... वाक्यजातं पुराणम्: इसका अर्थ है कि जगत् की प्रागवस्था (सृष्टि से पूर्व की अवस्था) का अनुसरण करके, सर्ग (सृष्टि) का प्रतिपादन करने वाला वाक्यसमूह (ग्रंथ) ही पुराण है। यह लक्षण मुख्य रूप से पुराणों के 'सर्ग' (सृष्टि) विषय पर बल देता है।

c. वायुपुराणम् (iv) यस्मात् पुरा हि अनति।

  • वायुपुराण स्वयं एक पुराण है और यह अपने नाम की व्युत्पत्ति बताता है।

  • यस्मात् पुरा हि अनति: यहाँ 'अनति' का अर्थ है 'जीवन प्राप्त करना/गति करना'

  • अर्थात्, 'यस्मात्' (जिससे) यह जगत् 'पुरा' (प्राचीन काल में) 'अनति' (जीवित होता है/गतिमान होता है) – वह पुराण कहलाता है। यह लक्षण पुराणों को सृष्टि के प्राण या मूल कारण से जोड़ता है।

d. मधुसूदन सरस्वती (i) विश्वसृष्टेः इतिहासः।

  • मधुसूदन सरस्वती एक प्रसिद्ध अद्वैत वेदान्ती दार्शनिक थे।

  • उन्होंने पुराणों को 'विश्वसृष्टि का इतिहास' माना है। उनके अनुसार पुराण पंचलक्षण (सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित) के माध्यम से संपूर्ण विश्व की सृष्टि प्रक्रिया को इतिहास के रूप में प्रस्तुत करते हैं।


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