Correct option is A
परिचय:
संस्कृत व्याकरण के इतिहास में पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि को संयुक्त रूप से मुनित्रय (तीन मुनि) कहा जाता है, जिनके कार्यों ने व्याकरण की परंपरा को पूर्णता दी।
व्याख्या
a. पाणिनिः → (i) अष्टाध्यायी
पाणिनि संस्कृत व्याकरण के सबसे प्राचीन और आधारभूत आचार्य हैं।
उनकी कृति अष्टाध्यायी (आठ अध्यायों वाली) व्याकरण का मूल ग्रंथ है, जिसमें लगभग 4000 सूत्र हैं। यह संस्कृत को नियमबद्ध करने वाली पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण रचना है।
b. पतञ्जलिः → (ii) महाभाष्यम्
पतञ्जलि मुनित्रय में तीसरे हैं। उन्होंने महाभाष्यम् (महान भाष्य) की रचना की।
यह ग्रंथ वस्तुतः पाणिनि के सूत्रों और उन पर लिखे गए कात्यायन के वार्तिकों की विस्तृत व्याख्या और रक्षा करने के लिए लिखा गया था। यह व्याकरण दर्शन का भी महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।
c. कात्यायनः → (iii) वार्तिकम्
कात्यायन (वररुचि के नाम से भी विख्यात) मुनित्रय में दूसरे हैं।
उन्होंने पाणिनि के सूत्रों पर वार्तिकों की रचना की। वार्तिक वे कथन होते हैं जो सूत्र में उक्त (कहे गए), अनुक्त (न कहे गए), और दुरुक्त (गलत तरीके से कहे गए) विषयों पर विचार करते हैं, जिससे सूत्र पूर्ण और स्पष्ट हो जाएँ।
d. भर्तृहरिः → (iv) वाक्यपदीयम्
भर्तृहरि शाब्दिक दार्शनिकों में प्रमुख हैं (लगभग 5वीं शताब्दी ईस्वी)।
उनकी रचना वाक्यपदीयम् संस्कृत व्याकरण के दार्शनिक पक्ष (जिसे शब्दब्रह्मवाद या व्याकरण दर्शन कहते हैं) का अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इसका केंद्रीय सिद्धांत है कि शब्द ही ब्रह्म है।