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एतेषु कथनेषु विचार्यताम् 1. महाभाष्ये शब्दस्य स्वरूपं निरूपितम्। 2. पतञ्जलिः पाणिनिवचनम् प्रमानयति। 3. व्याकरणस्य प्रयोजनं 'वेदानां रक्षा' इत
Question

एतेषु कथनेषु विचार्यताम्
1. महाभाष्ये शब्दस्य स्वरूपं निरूपितम्।
2. पतञ्जलिः पाणिनिवचनम् प्रमानयति।
3. व्याकरणस्य प्रयोजनं 'वेदानां रक्षा' इति महाभाष्ये निर्दिष्टम् ।
एतेषु कति कथनानि सम्यक् ?

A.

केवलम् एकम्

B.

केवलं द्वे

C.

सर्वे त्रयः

D.

न कश्चित्

Correct option is C


परिचय महाभाष्य महर्षि पतञ्जलि द्वारा पाणिनि के अष्टाध्यायी सूत्रों पर कात्यायन के वार्तिकों की समीक्षा के रूप में लिखा गया एक विशाल भाष्य ग्रंथ है, जो व्याकरण के दार्शनिक और प्रयोजनपरक पहलुओं का विवेचन करता है।
व्याख्या
दिए गए तीनों कथन सही हैं।
· (c) सर्वे त्रयः सम्यक् (तीनों कथन सही हैं)।
सही कथनों का विवरण:
1. महाभाष्ये शब्दस्य स्वरूपं निरूपितम्।
· यह कथन सही है।
· महाभाष्य के प्रथम आह्निक ('पस्पशाह्निक') में ही शब्द के स्वरूप पर गंभीर विचार किया गया है।
· महाभाष्यकार ने यह प्रश्न उठाया है कि 'शब्दः कः?' (शब्द क्या है?)। उत्तर में ध्वनि (स्फोट) और वर्णों (ध्वनि) को लेकर विभिन्न मतों का निरूपण किया गया है।
· 'येनोच्चारितेन सास्नादिमान् प्रतीयते स शब्दः' (जिसके उच्चारण से गलकम्बल वाला प्राणी (गाय) प्रतीत हो, वह शब्द है) और 'अथवा प्रतीतिपदार्थको लोके ध्वनिः शब्द इत्युच्यते' (अथवा लोक में जो पदार्थ की प्रतीति कराता है, वह ध्वनि ही शब्द कहलाती है) जैसे वाक्यों से शब्द के स्वरूप को स्पष्ट किया गया है।
2. पतञ्जलिः पाणिनिवचनम् प्रमानयति।
· यह कथन सही है।
· पतञ्जलि ने अपने महाभाष्य में पाणिनि के सूत्रों (वचनों) को परम प्रमाण माना है।
· महाभाष्य का मुख्य उद्देश्य ही पाणिनि के सूत्रों को निर्दोष सिद्ध करना और उनकी रक्षा करना है। उन्होंने कात्यायन के वार्तिकों के माध्यम से पाणिनि के वचनों का परिमार्जन और समर्थन किया है।
· पतञ्जलि प्रायः 'सिद्धम्' (पाणिनि का सूत्र सही है) या 'न वक्तव्यम्' (वार्तिक कहने की आवश्यकता नहीं है) कहकर पाणिनि के सूत्रों को ही अन्तिम प्रामाणिक मानते हैं।
3. व्याकरणस्य प्रयोजनं 'वेदानां रक्षा' इति महाभाष्ये निर्दिष्टम्।
· यह कथन सही है।
· महाभाष्य के प्रथम आह्निक में व्याकरण अध्ययन के मुख्य प्रयोजनों (प्रयोजनानि) का उल्लेख है।
· सबसे पहला और मुख्य प्रयोजन यही बताया गया है: "रक्षोहागम्लघ्वसंदेहाः प्रयोजनम्"
· इसमें 'रक्षा' का तात्पर्य 'वेदानां रक्षा' से है। पतञ्जलि कहते हैं कि व्याकरण का ज्ञान वेदों की विकृति (स्वर और वर्णों में परिवर्तन) से रक्षा करता है।
· "रक्षार्थं वेदानाम् अध्येयं व्याकरणम्" (वेदों की रक्षा के लिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए)।
रोचक तथ्य
· (a), (b), (d) विकल्प उपर्युक्त व्याख्या के आधार पर गलत सिद्ध होते हैं।
· महाभाष्य को त्रिमूर्ति व्याकरण ( पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि) में पतञ्जलि का ग्रन्थ माना जाता है। इसे प्रस्थान-ग्रन्थ (मुख्य आधार-ग्रन्थ) भी कहते हैं।

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