Correct option is C
भक्तमाल' के रचनाकार नाभादास हैं। यह ग्रंथ हिंदी साहित्य में भक्ति परंपरा का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। नाभादास जी ने 'भक्तमाल' की रचना 16वीं शताब्दी में अवधी भाषा में की थी। इस ग्रंथ में 200 से अधिक भक्ति संतों और उनके योगदान का वर्णन किया गया है। नाभादास ने भक्तों की महिमा का गान करते हुए भक्ति मार्ग को व्यापक रूप से जन-जन तक पहुँचाया।
भक्तमाल का उद्देश्य:
- भक्ति संतों के जीवन और उनकी शिक्षाओं को प्रस्तुत करना।
- भक्तिमार्ग को एक सुव्यवस्थित रूप में संकलित करना।
- भक्ति के आदर्शों और मूल्यों को जनसामान्य के लिए प्रेरणास्पद बनाना।
Information Booster:
नाभादास (1539–1645):
- नाभादास जी वल्लभाचार्य के शिष्य और उनके धर्म के प्रचारक थे।
- उन्होंने भक्ति परंपरा के महान संतों और उनके कार्यों को अपने ग्रंथ में संकलित किया।
भक्तमाल की विशेषताएँ:
- यह ग्रंथ अवधी भाषा में लिखा गया है।
- इसमें 200 से अधिक संतों का उल्लेख है, जैसे कि कबीर, मीरा, तुलसीदास, सूरदास आदि।
- यह ग्रंथ भक्ति काल के इतिहास और भक्ति परंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
भक्तमाल का प्रभाव:
- यह ग्रंथ भक्ति आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने का साधन बना।
- भक्ति संतों की शिक्षाओं और उनके कार्यों ने समाज सुधार में योगदान दिया।
Additional Knowledge:
तुलसीदास (1532–1623):
- 'रामचरितमानस' के रचयिता, जिन्होंने श्री राम की भक्ति पर आधारित साहित्य का सृजन किया।
नंददास (1533–1580):
- वल्लभाचार्य के शिष्य और श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त। उनकी प्रसिद्ध कृति 'रास पंचाध्यायी' है।
'भक्तमाल' का महत्त्व:
- यह भक्ति संतों की जीवनी और उनके योगदान का अद्भुत संग्रह है।
- इसमें भक्ति के आदर्श, जीवन जीने की पद्धति और भक्ति मार्ग की शिक्षाएँ दी गई हैं।