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    . निम्नलिखित में अस्तित्ववाद की विशेषताएं हैं-जीवन की निरर्थकता का बोधजीवन की सार्थकता का बोधमृत्यु-बोधपरम्परा के प्रति आस्था​
    Question

    . निम्नलिखित में अस्तित्ववाद की विशेषताएं हैं-

    1. जीवन की निरर्थकता का बोध
    2. जीवन की सार्थकता का बोध
    3. मृत्यु-बोध
    4. परम्परा के प्रति आस्था

    A.

    1 और 2

    B.

    1 और 3

    C.

    2 और 3

    D.

    3 और 4

    Correct option is B

    ans. (b) जीवन की निरर्थकता का बोध और मृत्यु-बोध अस्तित्ववाद की विशेषताएं हैं । 

    अस्तित्ववाद (Existentialism) एक दार्शनिक आंदोलन है, जिसका प्रारंभ डैनिश दार्शनिक सॉरेन किर्केगार्द के चिंतन से हुआ। किर्केगार्द ने हेगेलके विचारों का विरोध करते हुए व्यक्ति की स्वतंत्रता और आत्मगत सत्य पर बल दिया। उनके अनुसार, केवल व्यक्ति ही सत्य है; कोई विचार या सिद्धांत व्यक्ति से बड़ा नहीं हो सकता। मनुष्य के मन में परस्पर विरोधी विचार आते हैं, जिससे द्वंद्व और पीड़ा उत्पन्न होती है। इस पीड़ा को सहन करते हुए व्यक्ति निर्णय लेता है, जो उसकी स्वतंत्रता का प्रतीक है। भय और वेदना से हमें अपने अस्तित्व का बोध होता है, जिससे मृत्यु का एहसास होता है। इस प्रकार, किर्केगार्द निष्कर्ष निकालते हैं कि अपने 'होने' का बोध व्यक्ति के भीतर से होता है, अर्थात सत्य आत्मगत होता है, वस्तुगत नहीं।

    किर्केगार्द की मृत्यु (1855 ई.) तक अस्तित्ववाद का व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा था। उनकी मृत्यु के बाद, दार्शनिकों ने उनके महत्व को पहचाना। इस परंपरा में अन्य अस्तित्ववादी दार्शनिक जैसे कार्ल यास्पर्स,मार्टिन हाइडेगर,ज्याँ-पॉल सार्त्र, और अल्बेयर कामू प्रमुख हैं।

    अस्तित्ववाद की प्रमुख विशेषताएं:

    1. जीवन की निरर्थकता का बोध: अस्तित्ववादी विचारकों के अनुसार, जीवन स्वाभाविक रूप से किसी पूर्वनिर्धारित अर्थ या उद्देश्य से रहित है। मनुष्य को स्वयं अपने जीवन का अर्थ खोजना होता है, जो अक्सर निरर्थकता की भावना से उत्पन्न होता है।


    2. मृत्यु-बोध: अस्तित्ववाद में मृत्यु को जीवन की अंतिम सच्चाई के रूप में स्वीकार किया जाता है। मृत्यु का बोध व्यक्ति को अपने अस्तित्व की सीमाओं और जीवन के महत्व का एहसास कराता है, जिससे वह अपने जीवन के चुनावों के प्रति अधिक जागरूक होता है।


    3.   Information booster :

    अस्तित्ववाद की दो धाराएँ हैं:

    ​दार्शनिक परंपरा में पदार्थ और चेतना का द्वंद्व एक प्रमुख विषय रहा है। कुछ दर्शन पदार्थ और चेतना को एक-दूसरे का उत्पाद मानते हुए, उनके बीच 'अंतर्विरोध', 'तनाव', और 'संघर्ष' की बात करते हैं। यह संघर्ष पदार्थ और चेतना के बीच मौजूद रिश्तों का निषेध करता है और समन्वय की तलाश करता है, जिससे मनुष्य एक नई दुनिया बनाने का प्रयास करता है। यह प्रक्रिया 'द्वंद्वात्मक विकास' कहलाती है।

    अस्तित्ववादियों का मानना है कि कुछ दार्शनिक पदार्थ को महत्व देते हैं, जबकि अन्य चेतना को। लेकिन इन दोनों के बीच असल केंद्र 'मनुष्य' है, जिसकी चिंता अस्तित्ववाद करता है। कुछ विचारकों का मत है कि द्वंद्वात्मक दर्शन के बिना अस्तित्ववाद का प्रकट होना संभव नहीं था। हेगेल चेतना को महत्व देने के कारण आदर्शवादी दार्शनिक थे, जबकि मार्क्स पदार्थ को महत्व देने के कारण भौतिकवादी थे; दोनों द्वंद्ववाद में विश्वास करते थे। अस्तित्ववाद इन दोनों का ही विरोधी है, हालांकि ऐसा माना जाता है कि द्वंद्वात्मक दर्शन न होते तो अस्तित्ववाद का प्रकट होना संभव नहीं था। हेगेल के बाद जो अस्तित्ववाद सामने आया, वह आस्तिक अस्तित्ववाद है। अस्तित्ववाद के जनक किर्केगार्द ने हेगेल का विरोध किया।

      1. आस्तिक अस्तित्ववाद: यह धारा ईश्वर के अस्तित्व को मानती है। किर्केगार्द इसके प्रमुख प्रतिनिधि हैं।

      2. नास्तिक अस्तित्ववाद: यह धारा ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानती। सार्त्र इसके प्रमुख प्रतिनिधि हैं।

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