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 निम्नलिखित में से कौन-से दो ग्रंथ विशेष रूप से 'रस' से संबंधित है?1. दशरूपक2.  काव्यादर्श3.  साहित्यदर्पण4.काव्यालंकारन
Question

 निम्नलिखित में से कौन-से दो ग्रंथ विशेष रूप से 'रस' से संबंधित है?

1. दशरूपक

2.  काव्यादर्श

3.  साहित्यदर्पण

4.काव्यालंकार

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए-

A.

 1 और 3

B.

 1 और 2

C.

 2 और 4

D.

 3 और 4

Correct option is A

सही उत्तर:(a) 1 और 3

दशरूपक
लेखक: धनंजय
यह ग्रंथ नाट्यशास्त्र के दस रूपों का वर्णन करता है, जिसमें रसों की विशेष चर्चा की गई है।

साहित्यदर्पण
लेखक: विश्वनाथ
इस ग्रंथ के तृतीय परिच्छेद में रस-निष्पत्ति का विस्तृत विवेचन है, जिसमें विभिन्न रसों और नायक-नायिका भेद पर विचार किया गया है।

Information Booster:

1. दशरूपक

  • रचयिता: आचार्य धनंजय
  • काल: 10वीं शताब्दी
  • विवरण: यह ग्रंथ नाट्यशास्त्र के दस रूपों का विस्तृत वर्णन करता है, जिनमें नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, वीथि, अंक, ईहामृग, डिम और उत्सृष्टिकांक शामिल हैं। प्रत्येक रूपक के लक्षण, संरचना, रस, संधियाँ, पात्र, भाषा, वृत्ति, प्रवृत्ति, अभिनय, वेशभूषा आदि का विस्तार से वर्णन किया गया है। यह ग्रंथ नाट्यशास्त्र के अध्ययन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

2. काव्यादर्श

  • रचयिता: आचार्य दंडी
  • काल: 6ठी-7वीं शताब्दी
  • विवरण: यह संस्कृत काव्यशास्त्र का एक प्रमुख ग्रंथ है, जिसमें काव्य के तीन भेद—गद्य, पद्य, और मिश्र—का वर्णन है। गद्य को 'आख्यायिका' और 'कथा' में विभाजित किया गया है। इसके अतिरिक्त, वैदर्भी और गौड़ी नामक दो शैलियों तथा दस गुणों का परिचय भी दिया गया है। दंडी ने 35 अलंकारों का लक्षण, भेद, और उदाहरण सहित विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है, जो आगे के अलंकार शास्त्र के विकास में आधारभूत सिद्ध हुआ है।

3. साहित्यदर्पण

  • रचयिता: पंडित विश्वनाथ
  • काल: 14वीं शताब्दी
  • विवरण: यह ग्रंथ संस्कृत साहित्यालोचना का एक प्रमुख ग्रंथ है, जो 10 परिच्छेदों में विभक्त है। प्रथम परिच्छेद में काव्य के प्रयोजन, लक्षण आदि प्रस्तुत करते हुए 'वाक्यम् रसात्मकं काव्यम्' को शुद्धतम काव्य लक्षण माना गया है। द्वितीय परिच्छेद में शब्द की शक्तियों—अभिधा, लक्षणा, तथा व्यंजना—का विवेचन है। तृतीय परिच्छेद में रस-निष्पत्ति का विस्तृत विवेचन है, जिसमें नायक-नायिका भेद पर भी विचार किया गया है। चतुर्थ परिच्छेद में काव्य के भेद—ध्वनि काव्य और गुणीभूत व्यंग्य काव्य—का विवेचन है। पंचम परिच्छेद में ध्वनि-सिद्धांत के विरोधी मतों का तर्कपूर्ण खंडन और समर्थन है। छठे परिच्छेद में नाट्यशास्त्र से संबंधित विषयों का प्रतिपादन है, जो इस ग्रंथ की विशेषता है। सप्तम परिच्छेद में दोष निरूपण, अष्टम में गुणों का विवेचन, नवम में रीतियों पर विचार, और दशम में अलंकारों का सोदाहरण निरूपण किया गया है।

4. काव्यालंकार

  • रचयिता: आचार्य भामह
  • काल: 6ठी-7वीं शताब्दी
  • विवरण: यह संस्कृत का प्राचीनतम अलंकार शास्त्र का ग्रंथ माना जाता है। इसमें काव्य के लक्षण, उसके भेद, गुण, दोष, और अलंकारों का विस्तृत वर्णन है। भामह ने काव्य को 'शब्दार्थों सहितं काव्यम्' के रूप में परिभाषित किया है। उन्होंने 35 अलंकारों का वर्णन किया है, जिनमें उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, आदि प्रमुख हैं। भामह ने काव्य में अर्थ की प्रधानता मानी है और शब्द को उसके अनुगामी के रूप में स्वीकार किया है।

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