Correct option is B
ans. (b) अलंकार
भाषा भूषण एक अलंकारशास्त्र पर आधारित काव्यशास्त्रीय ग्रंथ है जिसके रचीयता महाराजा जसवंत सिंह है ।
भाषाभूषण के रचयिता जसवंतसिंह कौन थे, इस विषय में कुछ मतभेद है। साधारणतः यही प्रसिद्ध है कि ये जसवंतसिंह मारवाद के अधीश्वर थे, जो मुगल सम्राट औरंगजेब के प्रसिद्ध सेनानी थे। इसके विरुद्ध डाक्टर ग्रियर्सन ने लालचन्द्रिका की भूमिका में लिखा है कि ये फर्रुखाबाद जिले के अंतर्गत तिर्वा के राजा थे। अपनी सम्मति की पुष्टि में उन्होंने कुछ भी नहीं लिखा है। वे उसे सर्वमान्य सा मान कर लिख गए हैं ।
Information booster:
भाषा भूषण :
यह एक अलंकार निरूपक ग्रंथ है जिसमे 5 प्रकाश तथा 212 दोहे है , जसवंत सिंह ने अलंकार अविवेचन मे अप्पय दीक्षित कृत 'कुवलयानंद' तथा जयदेव कृत 'चंद्रलोक' का अनुसरण किया है ।
भाषा भूषण पर दलपति विजय ने 'अलंकाररत्नकार' नामक टीका की भी रचना की है ।
अलंकार -
अलंकार काव्यशास्त्र में उन तत्वों को कहते हैं जो काव्य की शोभा बढ़ाते हैं और उसे अधिक प्रभावशाली बनाते हैं। 'अलंकार' शब्द 'अलम्' (अर्थात् 'पर्याप्त' या 'योग्य') और 'कार' (अर्थात् 'करने वाला') से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'अलंकृत करने वाला'। काव्य में, अलंकार शब्द और अर्थ की सुंदरता को निखारते हैं, जिससे पाठक या श्रोता पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
अलंकार की परिभाषा :
1. आचार्य भामह:
भामह ने 'अलंकार' को काव्य का अनिवार्य तत्व मानते हुए कहा है कि-"न कान्तमपि निर्भूषं" -
जैसे बिना आभूषण के स्त्री का सौंदर्य अधूरा होता है, वैसे ही बिना अलंकार के काव्य में चमत्कार नहीं आ सकता। उनके अनुसार, अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाने वाले गुण हैं।
2. आचार्य दंडी:
दंडी के अनुसार, "काव्य शोभाकरान् धर्मान् अलंकरान् प्रचक्षते" अर्थात् काव्य के शोभाकारक धर्म (गुण) 'अलंकार' कहलाते हैं। उन्होंने अलंकारों को काव्य की सुंदरता बढ़ाने वाले तत्वों के रूप में परिभाषित किया है।
3. आचार्य वामन:
वामन ने कहा है, "अलंक्रियते अनेन इति अलंकारः" अर्थात् जो काव्य को अलंकृत करता है, वह अलंकार है। उनके अनुसार, अलंकार काव्य का ग्राह्य विषय है जो सौंदर्य की सृष्टि करता है।
4. आचार्य रुद्रट:
रुद्रट ने अलंकार को कवि की प्रतिभा से प्रकट होने वाले कथन विशेष के रूप में परिभाषित किया है। उन्होंने अलंकारों का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत करते हुए उन्हें शब्दालंकार और अर्थालंकार में विभाजित किया।
5. आचार्य विश्वनाथ:
विश्वनाथ के अनुसार, "शब्दार्थयोरस्थिराये धर्माः शोभित शायिनः" अर्थात् शब्द और अर्थ की विभूति बढ़ाने वाले अस्थिर धर्म ही अलंकार हैं। उन्होंने अलंकार को काव्य की शोभा बढ़ाने वाले अस्थायी गुणों के रूप में देखा है।
Additional Knowledge :
महाराजा जसवंत सिंह की अन्य रचनाएं -
1. प्रबोधचंद्रोदय - संस्कृत नाटक का ब्रिज भाषा मे अनुवाद ।
2. अनुभव प्रकाश
3. सिद्धांत बोध
4. आनंद विलास
5. सिद्धांत सार
6. अपरोक्ष सिद्धांत
इन रचनाओं मे वेदान्त की जानकारी है ।
