Correct option is D
सही उत्तर: (D) जय शंकर प्रसाद
स्पष्टीकरण:
जय शंकर प्रसाद हिंदी छायावाद युग के एक प्रमुख कवि, नाटककार और उपन्यासकार थे। छायावाद युग को हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, और जय शंकर प्रसाद इस युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं, जो हिंदी साहित्य में अपनी गहरी छाप छोड़ती हैं।
विकल्पों का विश्लेषण:
विकल्पों का विश्लेषण:
रचनाकार | परिचय | प्रमुख रचनाएँ |
|---|---|---|
रामचंद्र शुक्ल | आचार्य रामचंद्र शुक्ल (11 अक्टूबर, 1884ई.-2 फरवरी, 1941ई.) हिन्दी आलोचक, निबंधकार, साहित्येतिहासकार, कोशकार, अनुवादक, व्याख्याकार और कवि थे। उन्होंने हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण पुस्तकों के हिन्दी साहित्य का निर्धारण एवं पाठ्यक्रम निर्माण में सहायता की। हिन्दी के निबंध लेखन में भी शुक्ल जी का महत्वपूर्ण योगदान है। | हिन्दी साहित्य का इतिहास, रसमीमांसा, चिन्तामणि |
बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' | बद्रीनारायण चौधरी उपाध्याय "प्रेमघन" (1 सितम्बर 1855 ई.-प्रयाग शुक्ल 14, चैत्र 1978 हिन्दी साहित्यकार थे। वे भारतेंदु मंडल के उच्चतम सदस्य थे। हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपने तन-मन-धन से योगदान किया। | ‘गीति जनपद’, ‘अनंत अरुणाश्रु’, ‘हर्षिक हृदयेश’, ‘ममक-महिमा’, ‘उल्लासिक लीला’, ‘संग-विद्ध’, भारत संगीत सुधाकर, भारत भामिनी। |
मैथिलीशरण गुप्त | राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हिन्दी के प्रसिद्ध कवि हैं। उनकी पहली रचना ‘भारत-भारती’ (1912) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय की प्रेरणात्मक रचना के रूप में प्रतिष्ठित हुई। उनकी अन्य कृतियों ने भी उन्हें ख्यातिप्राप्त कराया। | साकेत, यशोधरा, भारत-भारती, पंचवटी, द्वापर, विकट भट, विशृंखल, वैतालिक, शक्तिपुत्र। |
छायावाद का परिचय
- छायावाद हिंदी साहित्य के रोमांटिक उत्थान की वह काव्य-धारा है, जो ई.स. 1920 से 1936 तक की प्रमुख युगवाणी रही।
- जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, और महादेवी वर्मा इस काव्य धारा के मुख्य कवि माने जाते हैं।
- छायावाद नामकरण का श्रेय मुकुटधर पांडेय को दिया जाता है।
- कृति प्रेम, नारी प्रेम, मानवीकरण, सांस्कृतिक जागरण, और कल्पना की प्रधानता छायावादी काव्य की विशेषताएं हैं।
- छायावाद ने हिंदी में खड़ी बोली कविता को पूरी तरह प्रतिष्ठित कर दिया।
- इसके बाद यह काव्य धारा अप्रभावी होकर साहित्य से बाहर हो गई।
- इससे हिंदी को नए शब्द, प्रतीक, और प्रतीतियां प्राप्त हुईं।
- इसके प्रभाव से इस युग की गद्य भाषा भी समृद्ध हुई और इसे ‘साहित्यिक खड़ी बोली का स्वर्णयुग’ कहा गया।