Correct option is C
सही उत्तर: (C) कबीरदास
दोहा:
माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख माहिं।
मनुआ तो चहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं॥
मनुआ तो चहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं॥
व्याख्या:
इस दोहे में कबीरदास जी सच्चे भक्ति भाव की ओर संकेत कर रहे हैं।
वह कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति हाथ में माला फेरता है, और मुँह से नाम जपता है,
परंतु उसका मन इधर-उधर भटकता रहता है, तो यह सच्चा सुमिरन नहीं है।
परंतु उसका मन इधर-उधर भटकता रहता है, तो यह सच्चा सुमिरन नहीं है।
कबीर का मानना है कि भक्ति हृदय और मन से होनी चाहिए, केवल बाहरी क्रियाएं करने से कोई लाभ नहीं होता।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
विकल्प | संबंधित जानकारी | क्या यह दोहा उनका है? |
|---|---|---|
(A) रहीम | नीति और व्यवहार पर दोहे लिखे | नहीं |
(B) तुलसीदास | रामचरितमानस और विनयपत्रिका के रचयिता | नहीं |
(C) कबीरदास | निर्गुण भक्ति मार्ग के महान संत, दोहों में सामाजिक और आध्यात्मिक बातों पर बल | हाँ |
(D) दादूदयाल | भक्ति आंदोलन के संत, पर यह दोहा उनका नहीं | नहीं |
निष्कर्ष:
यह दोहा कबीरदास जी का है, जो मन की एकाग्रता के बिना भक्ति को व्यर्थ बताते हैं।
अतः सही उत्तर है – (C) कबीरदास।
अतः सही उत्तर है – (C) कबीरदास।