Correct option is B
सही उत्तर: B. रैदास
व्याख्या:दी गई पंक्तियाँ रैदास जी के द्वारा रचित पद का अंश हैं। रैदास जी एक महान संत और भक्ति काव्य के कवि थे, जिन्होंने भगवान के प्रति भक्ति और निष्ठा को प्रमुखता दी।
पंक्तियाँ:"अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चन्दन हम पानी, जाकी अँग अँग बास समानी।"
यह पंक्ति रैदास जी के भक्ति पद का हिस्सा है, जिसमें उन्होंने भगवान राम के नाम के स्मरण की महिमा का वर्णन किया है और यह बताया है कि भगवान के नाम के स्मरण से सभी बुराइयाँ और सांसारिक बंधन समाप्त हो जाते हैं।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
तुलसीदास:
तुलसीदास जी का काव्य मुख्य रूप से रामकाव्य पर आधारित था, जैसे कि रामचरितमानस। हालांकि उनके काव्य में भगवान राम की महिमा का बखान किया गया है, लेकिन यह पंक्तियाँ उनकी नहीं हैं।
सूरदास:
सूरदास जी मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण के भक्त थे और उनके भक्ति काव्य में श्री कृष्ण की महिमा का वर्णन है। ये पंक्तियाँ सूरदास जी के काव्य से मेल नहीं खातीं।
कबीरदास:
कबीरदास जी के भक्ति काव्य में भी प्रभु की भक्ति और सत्य के प्रति निष्ठा पर जोर था। लेकिन यह पंक्तियाँ कबीरदास जी की शैली और काव्य से मेल नहीं खातीं।
निष्कर्ष:
यह पंक्तियाँ रैदास जी के भक्ति पद का हिस्सा हैं, इसलिए B. रैदास सही उत्तर है।
सभी विकल्पों की जीवनी और उनकी रचनाएँ:
1. तुलसीदास (1532-1623 ई.):
जीवनी: तुलसीदास हिंदी साहित्य के महान कवि और संत थे, जिनका जन्म उत्तर प्रदेश के राजापुर में हुआ था। वे रामभक्त थे और उनकी रचनाएँ भगवान श्रीराम के प्रति गहरी श्रद्धा से भरी हुई हैं। वे एक कवि, संत, और समाज सुधारक थे। उनकी भक्ति में भगवान राम के प्रति अत्यधिक प्रेम था।
प्रमुख रचनाएँ:
रामचरितमानस गोस्वामी जी का सर्वाति लोकप्रिय ग्रंथ रहा है। तुलसीदास ने अपनी रचनाओं के सम्बन्ध में कही उल्लेख नहीं किया है, इसलिए प्रामाणिक रचनाओं के संबंध में अंतस्साक्ष्य का अभाव दिखाई देता है। नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित ग्रंथ इसप्रकार हैं :
- रामचरितमानस
- रामललनहर्ष
- वैराग्य संदीपनी
- बड़े रामायण
- पर्वत मंगला
- जानकी मंगला
- रामाष्टप्रश
- दोहावली
- कवितावली
- गीतावली
- श्रीकृष्ण-गीतावली
- दीनपन्यत्रिका
- सतसई
- छंदवली रामायण
- कुंडलिया रामायण
- राम शलाका
- संकट मोचन
- रोलता रामायण
- सुलतान
- छप्पय रामायण
- कवितावत
- कोलधर्मि निष्पण
2. रैदास (1450-1520 ई.):
जीवनी: रैदास जी भारतीय संत और भक्ति कवि थे, जो विशेष रूप से राम और कृष्ण के भक्त थे। उनका जन्म काशी में हुआ था। रैदास जी ने अपने भक्ति काव्य में भगवान के प्रति निष्ठा और प्रेम का संदेश दिया और उन्होंने उच्च वर्ग की जातिवाद और सामाजिक असमानताओं का विरोध किया।
प्रमुख रचनाएँ:
- पद: रैदास जी के भक्ति पद में राम के नाम का महत्व और समाज सुधार की बातें प्रमुख हैं।
- भक्ति गीत: रैदास जी ने बहुत से भक्ति गीत लिखे जो आज भी लोकप्रिय हैं, जैसे "रैदास जी की पदावली"।
कृतियाँ-
- आदि ग्रन्थ में उपलब्ध रैदास की वाणी,
- रैदास की वाणी, वेलवेडियर प्रेस।
3. सूरदास (1478-1583 ई.):
जीवनी: सूरदास जी हिन्दी साहित्य के महान कवि और भक्ति संत थे। वे भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ था और वे श्री कृष्ण की बाल लीलाओं और उनकी महिमा पर आधारित काव्य रचनाएँ करते थे।
प्रमुख रचनाएँ:
सुरसागर, सुरसरावली, साहित्य लहरी, ब्याहलो, नल दमयंती आदि। सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं:
(1)सूरसागर- जो सूरदास की प्रसिद्ध रचना है। जिसमें सवा लाख पद संग्रहित थे। किंतु अब सात-आठ हजार पद ही मिलते हैं।
(2)सूरसारावली
(3)साहित्य-लहरी- जिसमें उनके कूट पद संकलित हैं।
(4)नल-दमयन्ती
(5)ब्याहलो
नागरी प्रचारिणी सभाद्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के 16 ग्रंथों का उल्लेख है। इनमें सूरसागर, सूरसरावली, साहित्य लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्, गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी, आदि ग्रंथ सम्मिलित हैं। इनमें प्रारम्भ के तीन ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं, साहित्य लहरी की प्राप्त प्रति में बहुत प्रक्षिप्तांश जुड़े हुए हैं।
4. कबीरदास (1398-1518 ई.):
जीवनी: कबीरदास जी भारतीय संत, भक्त और कवि थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था। वे समाज सुधारक थे और उनकी रचनाओं में भगवान के प्रति एकात्मता, सत्य और प्रेम का संदेश था। वे आस्थाओं और पंथों से परे एक सार्वभौमिक भगवान में विश्वास रखते थे।
प्रमुख रचनाएँ:
कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्होंने अपनी वाणी से स्वयं ही कहा है“मसि कागद छूयो नहीं, कलम गयो नहिं हाथ।”जिससे ज्ञात होता है कि उन्होंने अपनी रचनाओं को नहीं लिखा। इसके पश्चात भी उनकी वाणी से कहे गए अनमोल वचनों के संग्रह रूप का कई प्रमुख ग्रंथो में उल्लेख मिलता है। ऐसा माना जाता है कि बाद में उनके शिष्यों ने उनके वचनो का संग्रह‘बीजक’में किया।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी स्पष्ट कहा है कि,“कविता करना कबीर का लक्ष्य नहीं था, कविता तो उन्हें संत-मेंत में मिली वस्तु थी, उनका लक्ष्य लोकहित था।”कबीर की कुछ प्रसिद्ध रचनाएं इस प्रकार हैं:-
रचना | अर्थ | प्रमुख छंद | भाषा |
|---|
साखी | साक्षी | दोहा | राजस्थानी पंजाबी, मिली खड़ी बोली |
सबद | शब्द | गेय पद | ब्रजभाषा और पूर्वी बोली |
रमैनी | रामायण | चौपाई और दोहा | ब्रजभाषा और पूर्वी बोली |
संत कबीर दास जी को कई भाषाओं का ज्ञान था वे साधु-संतों के साथ कई जगह भ्रमण पर जाते रहते थे इसलिए उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान हो गया था। इसके साथ ही कबीरदास अपने विचारो और अनुभवों को व्यक्त करने के लिए स्थानीय भाषा के शब्दों का इस्तेमाल करते थे। जिसे स्थानीय लोग उनकी वचनो को भली भांति समझ जाते थे। बता दें कि कबीर दास जी की भाषा को‘सधुक्कड़ी’भी कहा जाता है।निष्कर्ष:
- तुलसीदास राम के भक्ति काव्य के महान कवि हैं, जिनकी रचनाएँ रामचरितमानस और हनुमान चालीसा प्रमुख हैं।
- रैदास जी के पद राम और कृष्ण की भक्ति से भरपूर हैं।
- सूरदास श्री कृष्ण के जीवन और उनकी लीलाओं पर आधारित कवि थे, जिनकी प्रमुख रचनाएँ सूरसागर और सूरबद्ध हैं।
- कबीरदास समाज सुधारक और भक्ति संत थे, जिनकी रचनाएँ बीजक और साखियाँ में समाहित हैं।