Correct option is C
यह प्रश्न
भारतीय दर्शन के
न्याय-वैशेषिक सम्प्रदाय के
सम्बन्ध विषय से संबंधित है।
परिचय
न्याय-वैशेषिक दर्शन में
सम्बन्ध दो प्रकार के माने गए हैं:
संयोग और
समवाय। इन दोनों के द्वारा ही पदार्थों के बीच का आधार-आधेय भाव (धारक और धार्य का भाव) व्यक्त होता है।
व्याख्या
दिए गए कथनों में,
कथन I सही है और
कथन II गलत है।
·
(c) I सत्यम् परन्तु II असत्यम् (कथन I सत्य है परन्तु कथन II असत्य है)।
कथन I : समवायः नित्यः अथ च अपृथक् सम्बन्धः अस्ति। · यह कथन
सत्य है।
·
समवाय एक
नित्य (शाश्वत, हमेशा रहने वाला) और
अयुतसिद्ध (अत्यन्त निकट, जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता) सम्बन्ध है।
· यह उन
पाँच पदार्थों के बीच होता है जिन्हें एक-दूसरे से
अलग नहीं किया जा सकता (जैसे
अवयव और अवयवी – तन्तुओं में वस्त्र,
गुण और गुणी – रूप में घट,
क्रिया और क्रियावान् – गमन में मनुष्य,
जाति और व्यक्ति – गोत्व में गाय, और
विशेष और नित्यद्रव्य – परमाणु में विशेष)।
· क्योंकि यह सम्बन्ध नित्य द्रव्यों में भी पाया जाता है, अतः यह
नित्य कहलाता है।
कथन II : संयोगः अनित्यः अथ च अपृथक् सम्बन्धः भवति। · यह कथन
असत्य है।
·
संयोग दो पृथक् पदार्थों के बीच होने वाला
अनित्य (क्षणिक, अस्थायी) सम्बन्ध है। यह
'युतसिद्ध' (जिन्हें अलग किया जा सकता है) पदार्थों में होता है।
· उदाहरण:
पुस्तक का
मेज पर होना (पुस्तक और मेज को अलग किया जा सकता है)।
· यह सम्बन्ध
अनित्य होता है (क्योंकि वियोग से इसका नाश हो जाता है)।
· परन्तु, यहाँ इसे
'अपृथक् सम्बन्धः' कहा गया है, जो
गलत है।
संयोग हमेशा
पृथक्/युतसिद्ध वस्तुओं में होता है।
अपृथक् सम्बन्ध के लिए
समवाय शब्द का प्रयोग होता है।
रोचक तथ्य
· (a), (b), (d) विकल्प उपर्युक्त व्याख्या के आधार पर गलत सिद्ध होते हैं।
·
संयोग एक
गुण है, जबकि
समवाय एक
पदार्थ (सम्बन्ध) है।
·
'पृथक्' का अर्थ है
युतसिद्ध (जिसे अलग किया जा सके), और
'अपृथक्' का अर्थ है
अयुतसिद्ध (जिसे अलग न किया जा सके)।