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    . "सुंदरता का आलोकस्त्रोत है फूट पड़ा मेरे मन में। जिससे नवजीवन का प्रभात होगा फिर जग के आँगन में।"उपर्युक्त पंक्तियों के रचयिता हैं-
    Question

    . "सुंदरता का आलोकस्त्रोत है फूट पड़ा मेरे मन में। जिससे नवजीवन का प्रभात होगा फिर जग के आँगन में।"
    उपर्युक्त पंक्तियों के रचयिता हैं-

    A.

    जयशंकर प्रसाद

    B.

    सुमित्रानंदन पंत

    C.

    सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

    D.

    महादेवी वर्मा

    Correct option is B

    सही उत्तर:
    (b) सुमित्रानंदन पंत

    व्याख्या:

    प्रस्तुत पंक्तियाँ हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत की रचना 'सुंदरता का आलोक' कविता  से उद्धृत हैं। पंत जी छायावाद युग के प्रमुख कवियों में से एक थे, जिनकी कविताएँ प्रकृति, सौंदर्य, और मानवता के प्रति गहरी संवेदनशीलता को दर्शाती हैं। इन पंक्तियों में उन्होंने सुंदरता के आलोकस्त्रोत के मन में फूटने और उससे नवजीवन के प्रभात के जग के आँगन में होने की बात कही है, जो उनकी काव्य शैली की विशेषता है।

    Information Booster:

    1. सुमित्रानंदन पंत:

      • सुमित्रानंदन पंत (20 मई 1900 – 28 दिसंबर 1977) हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख कवि थे, जिन्हें 'प्रकृति के सुकुमार कवि' के रूप में भी जाना जाता है।
      • प्रारंभिक जीवन:पंत जी का जन्म उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कौसानी गाँव में हुआ था। जन्म के कुछ घंटों बाद ही उनकी माता का निधन हो गया, और उनका लालन-पालन उनकी दादी ने किया। बचपन में उनका नाम गोसाईं दत्त था, जिसे उन्होंने बाद में बदलकर सुमित्रानंदन पंत कर लिया।
      • शिक्षा:उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में प्राप्त की और बाद में काशी के क्वींस कॉलेज में अध्ययन किया। इलाहाबाद के म्योर कॉलेज में भी उन्होंने शिक्षा ग्रहण की, लेकिन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर उन्होंने औपचारिक शिक्षा छोड़ दी और स्वाध्याय के माध्यम से हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, और अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन किया।
      • साहित्यिक यात्रा:पंत जी की काव्य यात्रा को तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया जा सकता है:
      • छायावादी चरण (1916-1935): इस अवधि में उनकी रचनाएँ प्रकृति, सौंदर्य, और कोमल भावनाओं से ओतप्रोत थीं। 'पल्लव' इस दौर की उनकी प्रसिद्ध कृति है।

      • प्रगतिवादी चरण: इस समय वे मार्क्स और फ्रायड के विचारों से प्रभावित होकर सामाजिक यथार्थ और मानवतावादी दृष्टिकोण की ओर उन्मुख हुए। 'ग्राम्या' और 'युगांत' इस चरण की प्रमुख रचनाएँ हैं।

      • अध्यात्मवादी चरण: श्री अरविंद के दर्शन से प्रभावित होकर उन्होंने आध्यात्मिक चेतना से युक्त रचनाएँ कीं, जिनमें 'स्वर्णकिरण' और 'स्वर्णधूलि' प्रमुख हैं।

      • प्रमुख रचनाएँ:उनकी साहित्यिक कृतियों में 'पल्लव', 'ग्राम्या', 'युगांत', 'स्वर्णकिरण', 'स्वर्णधूलि', 'कला और बूढ़ा चाँद', 'चिदंबरा', और 'लोकायतन' शामिल हैं। 'चिदंबरा' के लिए उन्हें 1968 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
      • सम्मान और पुरस्कार:पंत जी को उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले, जिनमें 1961 में पद्मभूषण, 1960 में 'कला और बूढ़ा चाँद' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, और 1968 में 'चिदंबरा' के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार शामिल हैं।
      • निधन:28 दिसंबर 1977 को इलाहाबाद में उनका निधन हुआ। उनकी स्मृति में कौसानी स्थित उनके घर को 'सुमित्रानंदन पंत साहित्यिक वीथिका' के रूप में संग्रहालय में परिवर्तित किया गया है, जहाँ उनकी व्यक्तिगत वस्तुएँ और रचनाएँ संरक्षित हैं।
      • साहित्यिक योगदान:सुमित्रानंदन पंत की रचनाएँ हिंदी साहित्य में प्रकृति, सौंदर्य, और मानवतावादी दृष्टिकोण के लिए सदैव स्मरणीय रहेंगी। उनकी कविताएँ भाषा की कोमलता, विचारों की गहराई, और संवेदनशीलता के लिए विशेष रूप से जानी जाती हैं।
    2. प्रकृति चित्रण:

      • पंत जी की कविताओं में प्रकृति का सजीव और सुंदर चित्रण मिलता है।
      • उनकी कविताएँ प्राकृतिक सौंदर्य के माध्यम से मानवीय भावनाओं को व्यक्त करती हैं।

    Additional Knowledge:

    • जयशंकर प्रसाद:

      • हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख कवि, नाटककार, और उपन्यासकार।
      • प्रमुख कृतियाँ: कामायनी, आंसू, झरना
    • सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला':

      • छायावादी युग के महत्वपूर्ण कवि, उपन्यासकार, और निबंधकार।
      • प्रमुख कृतियाँ: अनामिका, परिमल, कुकुरमुत्ता
    • महादेवी वर्मा:

      • छायावादी युग की प्रमुख कवयित्री, जिन्हें 'आधुनिक मीरा' भी कहा जाता है।
      • प्रमुख कृतियाँ: नीरजा, सांध्यगीत, यामा

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