Correct option is D
Ans.(d)
: पुरुरवा द्वारा कहे गए संवाद हैं- "मैं तुम्हारे हाथ का लीला-कमल हूँ" तथा "प्रेम केवल जलन नहीं, वह अमृत-शिखा भी है"।
'उर्वशी' रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित एक महत्त्वपूर्ण काव्य है, जो 1961 में प्रकाशित हुआ। इस काव्य में दिनकर ने उर्वशी और पुरुरवा की प्राचीन कथा को नए अर्थों में प्रस्तुत किया है। 'उर्वशी' प्रेम और सौंदर्य का काव्य है, जिसमें जीवन दर्शन की विभिन्न धाराएँ समाहित हैं। इस उत्कृष्ट कृति के लिए दिनकर को 1972 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
कथानक:'उर्वशी' में पुरुरवा और उर्वशी की प्रेम कथा के माध्यम से मानव और दिव्य प्रेम के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया गया है। पुरुरवा पृथ्वी पुत्र हैं, जिनमें देवत्व की तृष्णा है, जबकि उर्वशी स्वर्ग से उतरी हुई नारी हैं, जो पृथ्वी के सुखों का अनुभव करना चाहती हैं। काव्य में प्रेम की विभिन्न छवियों को मनोवैज्ञानिक धरातल पर प्रस्तुत किया गया है।
भाषा और शैली:दिनकर की भाषा में सादगी और प्रत्यक्षता है, लेकिन 'उर्वशी' में उन्होंने अलंकृत और आभिजात्य भाषा का प्रयोग किया है, जो कृति की विषयवस्तु के अनुरूप है। काव्य में गीतिनाट्य शैली का प्रयोग किया गया है, जो इसे महाकाव्य से अलग पहचान देता है।
प्रमुख पात्र:
विशेषताएँ:'उर्वशी' में प्रेम और सौंदर्य की मूल धारा में जीवन दर्शन की अन्य छोटी-छोटी धाराएँ आकर मिलती हैं। कवि ने प्रेम की छवियों को मनोवैज्ञानिक धरातल पर पहचाना है। दिनकर की भाषा में हमेशा एक प्रत्यक्षता और सादगी दिखी है, परन्तु 'उर्वशी' में भाषा की सादगी अलंकृति और आभिजात्य की चमक पहन कर आयी है, जो इस कृति की वस्तु की माँग रही हो
Information Booster:
उर्वशी काव्य नाटक 5 अंकों मे विभक्त है
पुरुरवा के प्रमुख संवाद :
" जब से हम तुम मिले न जाने ,कितने अभिसारों मे
रजनी कर शृंगार सितासित मभ मे घूम चुकी है"
"मिल भी गई उर्वशी यदितुम को इन्द्र की कृपा से
उसका हृदय कपाट कोण तेरे निमित्त खोलेगा "
उर्वशी के प्रमुख संवाद :
"शिखरों मे जो मौन ,वही झरनों मे गूंज रहा है ,
ऊपर जिसकी ज्योति,छिपा है वही गर्त के तम में "
Additional Knowledge:
दिनकर कुछ प्रमुख रचनाएं :
- पुरुरवा: प्रतिष्ठानपुर के राजा, जो उर्वशी के प्रेम में आकंठ डूबे हैं।
- उर्वशी: स्वर्ग की अप्सरा, जो पुरुरवा के प्रेम में पृथ्वी पर आने को तत्पर हैं।
- औशीनरी: पुरुरवा की पत्नी, जो उनके प्रेम और दुविधाओं की साक्षी हैं।
- सहजन्या, रम्भा, मेनका, चित्रलेखा: अन्य अप्सराएँ, जो उर्वशी की सखियाँ हैं।
प्रणभंग (1928): यह उनकी प्रारंभिक रचनाओं में से एक है, जिसमें राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है।
रेणुका (1935): इस संग्रह में मातृभूमि के प्रति प्रेम और समर्पण की भावनाएँ व्यक्त की गई हैं।
हुंकार (1938): यह काव्य संग्रह स्वतंत्रता संग्राम के समय की भावनाओं को प्रकट करता है, जिसमें विद्रोह और संघर्ष की झलक मिलती है।
रसवंती (1939): इसमें श्रृंगार रस की कविताएँ संकलित हैं, जो प्रेम और सौंदर्य के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती हैं।
कुरुक्षेत्र (1946): महाभारत के शांति पर्व पर आधारित यह प्रबंध काव्य द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थितियों पर केंद्रित है, जिसमें युद्ध और शांति के बीच के द्वंद्व को दर्शाया गया है।
रश्मिरथी (1952): यह प्रबंध काव्य महाभारत के पात्र कर्ण के जीवन पर आधारित है, जिसमें उनकी संघर्षपूर्ण जीवन यात्रा का वर्णन है।
परशुराम की प्रतीक्षा (1963): यह काव्य संग्रह सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर केंद्रित है, जिसमें परशुराम के प्रतीक के माध्यम से अन्याय के खिलाफ संघर्ष की बात की गई है।
उर्वशी (1961): इस काव्य में उर्वशी और पुरुरवा की प्रेम कथा के माध्यम से मानवीय प्रेम, वासना और संबंधों की गहनता को प्रस्तुत किया गया है।