Correct option is A
राग
अहीर भैरव को उत्तरांग प्रधान राग कहा जाता है, क्योंकि इसका प्रमुख विकास
उत्तरांग (upper portion) में होता है, जो उच्च सप्तक और मध्य सप्तक के स्वरों में केंद्रित होता है। इस राग में विशेष ध्यान ऊपरी चतु:स्वर संघात पर दिया जाता है, यानी राग का मुख्य स्वर और उसकी विस्तार प्रक्रिया अधिकतर उच्च सप्तक पर आधारित होती है। राग अहीर भैरव में ऋषभ (रे) और निषाद (नि) कोमल होते हैं, और यह भैरव थाट से उत्पन्न माना जाता है। इसका उपयोग प्रातःकाल में किया जाता है, और यह गंभीर और भक्ति प्रधान राग माना जाता है। राग अहीर भैरव को भैरव थाट के रूप में माना जाता है और यह भैरव की गंभीरता और शुद्धता के साथ खमाज और काफी राग के स्वरों को मिश्रित करता है। इसकी विशेषता यह है कि इसका आरोह उत्तरांग से शुरू होता है, और अवरोह में अधिकतर शुद्ध और कोमल स्वर उपयोग में लाए जाते हैं। इसे सुनने से शांति और समर्पण का अनुभव होता है।
मुख्य बिंदु:
1. अहीर भैरव को
उत्तरांग प्रधान राग कहा जाता है, जिसका विस्तार उच्च सप्तक में होता है।
2. इसमें
ऋषभ (रे) और
निषाद (नि) कोमल होते हैं, जो इसे अन्य रागों से भिन्न बनाता है।
3. राग अहीर भैरव का गायन
प्रातःकाल के पहले प्रहर में किया जाता है।
4. इस राग का उपयोग
भक्ति भाव और
गंभीरता को व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
5. राग का वादी स्वर
मध्यम और संवादी स्वर
षडज होते हैं।