Correct option is D
परिचय
मनुस्मृति प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण धर्मशास्त्र है जो सामाजिक व्यवस्था, कर्तव्यों और नियमों का विस्तृत वर्णन करता है, जिसमें वर्ण व्यवस्था और उनके कर्तव्य भी शामिल हैं।
व्याख्या
A-IV (ब्राह्मणस्य - मङ्गल्यम्): मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मणों का जीवन और उनके कार्य 'मङ्गल्यम्' (शुभऔर कल्याणकारी) होते हैं, क्योंकि वे वेदों का अध्ययन, अध्यापन और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, जो समाज के लिए शुभ माने जाते हैं।
B-III (क्षत्रियस्य - बलान्वितम्): क्षत्रियों का मुख्य कर्तव्य समाज की रक्षा करना है, जिसके लिए उन्हें 'बलान्वितम्' (बलशाली और शक्तिशाली) होना आवश्यक है ताकि वे युद्ध में शत्रुओं का सामना कर सकें और प्रजा की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकें।
C-II (वैश्यस्य - धनसंयुक्तम्): वैश्य वर्ण का प्रमुख कार्य कृषि, पशुपालन और व्यापार करना है, जिससे धन का संचय होता है। अतः, उनका जीवन 'धनसंयुक्तम्' (धन से युक्त) होता है, जो आर्थिक समृद्धि का प्रतीक है।
D-I (सूद्रस्य - जुगुप्सितम्): शूद्रों का कार्य अन्य तीनों वर्षों की सेवा करना है। मनुस्मृति के कुछ व्याख्यानों में उनके कार्य को 'जुगुप्सितम्' (निंदनीय या घृणित) बताया गया है, जो उस समय की सामाजिक सोच को दर्शाता है, हालांकि आधुनिक परिप्रेक्ष्य में यह स्वीकार्य नहीं है।
रोचक तथ्य
जुगुप्सितम्ः यह शब्द शूद्रों के प्रति उस समय की सामाजिक धारणा को दर्शाता है, जहाँ उनके कार्यों को निम्न दृष्टि से देखा जाता था, जबकि आधुनिक समाज में श्रम का सम्मान किया जाता है।
मङ्गल्यम्, बलान्वितम्, धनसंयुक्तम्ः ये तीनों शब्द क्रमशः ब्राह्मणों के ज्ञान और आध्यात्मिकता, क्षत्रियों के शौर्य और रक्षा, और वैश्यों की आर्थिक भूमिका को उजागर करते हैं, जो उस व्यवस्था में उनके महत्व को दर्शाते हैं।