Correct option is A
परिचय
यह प्रश्न बौद्ध दर्शन के चार प्रमुख सम्प्रदायों- सौत्रान्तिक, वैभाषिक, योगाचार और माध्यमिक -तथा बाह्य जगत (अर्थात् बाहरी वस्तुओं) के सम्बन्ध में उनके दार्शनिक दृष्टिकोणों को सुमेलित करने से सम्बन्धित है।
व्याख्या
दिए गए विकल्पों में, सही सुमेलन इस प्रकार है:
A. सौत्रान्तिकाः - सौत्रान्तिका सम्प्रदाय यह मानता है कि बाड़ा पदार्थ प्रत्यक्ष नहीं होते, अपितु उनका अनुमान किया जाता है। इसलिए, यह "बाह्यार्थानुमेयं स्वीकुर्वन्ति" (बाह्वा पदार्थों को अनुमेय मानते हैं) से सुमेलित है।
B. वैभाषिकाः - वैभाषिका सम्प्रदाय बाह्य पदार्थों को प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करता है, अर्थात् उनका सीधा अनुभव होता है। इसलिए, यह "बाह्यार्थप्रत्यक्ष स्वीकुर्वन्ति" (बाह्य पदार्थों को प्रत्यक्ष मानते हैं) से सुमेलित है।
C. योगाचारा (विज्ञानवाद): -योगाचार सम्प्रदाय, जिसे विज्ञानवाद भी कहते हैं, बाह्य पदार्थों के अस्तित्व को अस्वीकार करता है और मानता है कि सब कुछ विज्ञान (चेतना) में ही है। इसलिए, यह "बाह्यार्थशून्यत्वं स्वीकुर्वन्ति" (बाह्य पदार्थों की शून्यता को स्वीकार करते हैं) से सुमेलित है।
D. माध्यमिका (शून्यवादा): - माध्यमिका सम्प्रदाय, जिसे शून्यवादा भी कहते हैं, सभी धर्मों (तत्त्वों) की निःस्वभावता या शून्यता का प्रतिपादन करता है, जिसमें बाह्य और आन्तरिक दोनों प्रकार के पदार्थ शामिल हैं। इसलिए, यह "सर्वशून्यत्त्वं स्वीकुर्वन्ति" (सबकी शून्यता को स्वीकार करते हैं) से सुमेलित है।
इस प्रकार, सही विकल्प (A) A-III, B-IV, C-I, D-II है।
रोचक तथ्य
- बाह्यार्थशून्यत्वं स्वीकुर्वन्ति (1): यह योगाचार सम्प्रदाय का मुख्य सिद्धान्त है, जिसे विज्ञानवाद भी कहते हैं। इसके अनुसार, बाहरी दुनिया का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है, सब कुछ मन या चेतना (विज्ञान) की ही अभिव्यक्ति है।
सर्वशून्यत्त्वं स्वीकुर्वन्ति (II): यह माध्यमिक सम्प्रदाय का मूल सिद्धान्त है, जिसे नागार्जुन ने प्रतिपादित किया था। इसके अनुसार, सभी धर्म (पदार्थ) स्वभाव से शून्य हैं, अर्थात् उनका कोई अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।
बाह्यार्थानुमेयं स्वीकुर्वन्ति (III): सौत्रान्तिक राम्प्रदाय का यह मत है कि हम बाहरी वस्तुओं का सीधे अनुभव नहीं करते, बल्कि उनके प्रभावों के आधार पर उनका अनुमान लगाते हैं। जैसे, धुएँ को देखकर आग का अनुमान लगाना।
बाह्यार्थप्रत्यक्ष स्वीकुर्वन्ति (IV): वैभाषिका सम्प्रदाय यथार्थवादी है और मानता है कि बाहरी वस्तुएँ वास्तविक हैं और उनका सीधा प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।